सौरभ और रागिनी दोनों आई टी फील्ड में काम करते थे। दिन और रात का काम। दोनों उन्नति के शिखर को छूते गये। पैसों की भरमार थी। बच्चों के लिये कोई रोकटोक न थी। वास्तव में खुशियों के स्थान पर उन्हें बहुत सारे पैसे दिये जाते। दोनों बच्चे सुबोध और संध्या भी यही समझते कि पैसों से हर खुशियां खरीदी जा सकती हैं।
दोनों मेला देखकर वापस आ रहे थे। मेला में बहुत सारे झूले झूले। मन मुताबिक खर्च किया। आखिर पैसे की कोई कमी तो न थी।
एक बच्चा अपने पिता के कंधे पर बैठा जा रहा था। इतना खुश कि उसने स्वर्ग का राज्य पा लिया हो। सुबोध और संध्या सोच में पड़ गये। क्या वह चाहकर भी उस बच्चे जैसी खुशियां खरीद सकते हैं।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

4 टिप्पणियाँ