न तन की चाहत
न मन की चाहत
बस है ख़ालिश
कफन की चाहत
ये जिस्म फ़ना हो जाए जिसकी आन पर
और बुलंदी छुए जिसकी हर मक़ाम पर
बस है ख्वाहिश अपने वतन की चाहत
न तन की चाहत
न मन की चाहत....... 2
जो हर बाग़ फूलों से खिल उठे
जहां दो मन एक हों और मिल उठे
और घटा भी आकर बरस जाए
और मन मिलने को तरस जाए
बस है ख्वाहिश ऐसे चमन की चाहत
न तन की चाहत
न मन की चाहत....... 2
जहां बाजुएं जोर से फड़कने लगे
जहां दुश्मन भी देखकर डरने लगे
जो आँख उठाए देश की अस्मिता पर
उसकी ढीठ उठती नजर को झुकाकर
बस है ख्वाहिश ऐसे दमन की चाहत
न तन की चाहत
न मन की चाहत....... 2
जब मन मचले तो देश के लिए
जब प्राण निकले तो देश के लिए
जब शरीर तिरंगे मे लिपटा हो
और सारा आकाश मुझमे सिमटा हो
बस है ख्वाहिश ऐसे गमन की चाहत
न तन की चाहत
न मन की चाहत....... 2
जहां प्राण जाने का न हो डर कहीं
लहू गिरे मगर कोई फिकर नही
बस तारा बनकर चमक जाऊं
और ज्वाला बनकर दमक जाऊं
बस है ख्वाहिश ऐसे गगन की चाहत
न तन की चाहत
न मन की चाहत.......2
आपका मुकेश "लखनवी"

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