पुकारते है तुमको हम
आ जाओ तुम जहाँ भी हो
सहा ना जाए ये अकेलापन 
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!
ये शाम भी बड़ी सुहानी है 
ठंडी पवन यूं अगन लगाए 
मुझे मार ना डाले जुदाई ये 
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!
चंचल से वो नयन नशीले 
गहरी मादक मुस्कान तेरी
सोच कर पागल हो ना जाऊँ 
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!
बारिश की ये हल्की बूँदे 
यूं तन मन को भड़काए 
कहीं जल ना जाए ये बदन
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!
थी ख़ुदा की भी मर्जी कुछ 
जो उसने हमें यूं मिलाया
मासूम तुम और निर्दोष हम
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!
पुकारते है तुमको हम
आ जाओ तुम जहाँ भी हो!!
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा)