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रावण त्रेता युग का है एक विद्वान पंडित था।
उसका कुकर्म मात्र वह सीताहरण किया था।
अपनी मर्यादा का सदा ध्यान रखा रावण ने।
कोई जोर जुल्म सीता से ना कभी किया था।
निजी महल में वह सीता को कभी नहीं रखा।
अशोक वाटिका में ही वह माँ सीता को रखा।
जोर जबरदस्ती भी कोई उसने कभी न किया।
सीता माँ के रक्षा में उसने त्रिजटा को था रखा।
आज तो हर घर में दुर्योधन रावण हैं विद्यमान।
चरित्र की बात छोड़ें माँ-बाप का भी नहीं मान।
रोज ही चीर हरण करते करते सीता हरण भी।
ना समाज का डर कोई ना अपनी कोई मर्यादा।
बेटियों की लाज बचे कैसे रास्ता चलना दूभर है।
किडनैपिंग बलात्कार रोज जोरजबरदस्ती होती।
संस्कार की कमी है ये मूल्यों आदर्शों की कमी है।
इज्जत लूट रहे नारी की हत्या करने पर आमादा।
कलयुगी ये रावण हैं मंदोदरी नहीं समझा सकती।
माँ-बाप बेचारे लाचार स्वयं इन्हें ना समझा सकते।
सजा देर से मिलती इनको यह कानून खराबी है।
इनकी करनी का फल जब मिलता है तो रोते यह।
फाँसी से हमें बचायें हम ऐसा नहीं करेंगे जीवन मे।
कुत्ते की पूंछ ना सीधी होती सीधी है तो पागल है।
रावण तो मरता जलताहै केवल दसमी दशहरा में।
कलयुगी रावणों को फाँसी दें केवल यही सजा है।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

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