संस्कारों की नीव टूट रही है
रिश्तो की डोरी छूट रही है
जाने कहां खो गए वो रीत पुराने
अब तो अपनों से अपने ही हैं बेगाने
ना दिलों में वो स्नेह सम्मान बचा
ना वो हंसता खेलता परिवार बचा
ना अब बुजुर्गों की डांट सुनने को मिलती है
ना अब पोता पोती दादी के हाथ पलती है
जाने कहां से आया यह चलन वृद्धा आश्रमों का
जो मानवता को भी शर्मसार करती है
जाने कैसे खत्म हो रहा वह प्यार
जाने कैसे बेटा बेटी करते अपने मां-बाप का त्याग
यह संस्कृति हमारी तो नहीं जाने कहां से आई है
दो अक्षर क्या पढ़ लिए मानवता ही भुलाई है
जिसने सिचा हमें अपने प्यार से
खुद जलकर हमें राहों में रोशनी दिखाई है
उनके प्यार और संस्कार को भूलती है
जाने कहां से आया यह चलन वृद्ध आश्रमों का
जो मानवता को भी शर्मसार करती हैं
अपनी संस्कृति का जरा ज्ञान रखो
दिल में बड़ों का सम्मान रखो
हमारे बुजुर्ग वो नीव है
जिनके सहारे आबाद हमारी जिंदगी है
यह वृद्धा आश्रमों का चलन हमारा नहीं
यह तो विदेशी संस्कृति है
हमने तो सीखा है हरदम
प्यार और सम्मान करना
वृद्ध आश्रमों में नहीं अपने माता-पिता को
अपने घर मंदिर में ईश्वर सा स्थापित करना
प्रांशु गुप्ता
(रायगढ़ छत्तीसगढ़)

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