आज मै आप सबके समक्ष मर्यादा पुरुषोत्तम राम और महान पंडित रावण के मध्य युद्ध का वर्णन कर रहा हूँ (अद्धभुत रस मे )



लेता रावण विकराल स्वरूप 
बदल रहा है अनेक रूप 
कभी हो रहा है इस ओर 
कभी हो रहा है उस ओर 
बदल रहा पल भर मे छोर 
सीने मे प्रतिशोध की ज्वाला लिए 
और वाणी मे अपशब्दों की हाला लिए 
कर रहा राम से प्रचंड युद्ध 
हो करके सम्मुख प्रबुध्द 
आश्चर्य की पारावार उधर 
शय्या की बहती धार जिधर 
बड़ा हठी किन्तु ज्ञानी है 
बस युद्ध करने की ठानी है 
ऐसा करके शायद उसे 
अपने कुल की लाज बचानी है
पर्वत भी है खुद झुका हुआ 
सागर का लहर भी रुका हुआ 
इंद्र का सिंहासन डोल रहा 
आश्चर्य का न कोई मोल रहा 
डगमग डगमग धरती डोली 
भरती कौतुहलता की झोली
घटा भी अपना रुख बदल गया 
जो जहां है वहां पर संभल गया  
ये दृश्य देख हो रहा कौतुहल 
कोई तो हो इस समस्या का हल 
देख रावण की दम्भ चाल 
दिग दिगंत का बुरा हाल 
आज होने वाला है अंतिम युद्ध 
हो रहे है मनुज और देव निहाल 
राम ने बाण का संचार किया 
उसके सर पर सीधे वार किया 
मगर ये कैसी माया है 
सबको आश्चर्य मे लाया है 
सर पे सर है कटता हुआ 
मगर फिर है जुड़ता हुआ
मगर तभी सुनाया विभीषण ने हाल 
उसके नाभि मे अमृत कमाल 
गर उसपर हो जाए सीधा वार 
तो होगा रावण पल भर मे लाचार 
इस तरह नाभि पर वार हुआ 
फिर रावण का संहार हुआ 
आश्चर्य युक्त कथा वृत्तांत 
इस तरह हुआ युद्ध का अंत

आपका मुकेश "लखनवी"