ये लो आगई बरसात अब तो,
मौसम यह हुआ बड़ा सुहाना।
तपिस मिटी उमस सब भागी,
धरा प्रकृति सब बड़ा सुहाना।
मन प्रसन्न बारिस की बूंदों से,
बरस रहा हर आँगन में पानी।
खेत बाग सब वन उपवन यह,
जैसे ओढ़ी हो नई चूनर धानी।
रेनकोट व छाते का दिन लौटा,
हमें बचाये ये बरसे जब पानी।
मंद-2 ये शीतल हवा चले जब,
छोड़ें ये फुहारें वर्षा ऋतु रानी।
धरती की प्यास बुझाये ये जल,
सूखे तालाब भर गए लबालब।
नदियाँ भी हैं वर्षा में उफान पर,
अविरल बहें जल भरा डबाडब।
छतें टपकें पुरानी टपके खपरैल,
छान छप्पड़ ये टपकाते हैं पानी।
गली मोहल्ले घरों में भरता जल,
ये कीचड़ फैलाये वर्षा का पानी।
काली घटा बरसते देखें ये मेघा,
विद्युत तड़के वर्षा का ये आनंद।
गरम पकौड़े संग चाय चुस्कियां,
लेते रहें उठाइये घर बैठे आनंद।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

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