समुद्र किनारे बने हुए वो कदमों के निशान,
बारिस की बूंदों से मिट जाते है।
अतीत में देखे थे जो अनगिनत ख्वाब,
वो समय के साथ दफ़न हो जाते है।
ढूंढना अपने वजूद को हजार बार चाहा,
परन्तु रह गयी बन कर तुम्हारी परिछाई।
सात फेरों के उस बन्धन में बंधकर,
तेरे पीछे-पीछे चली आयी।
छोड़ आई बावुल के घर अपनी हर खुशी को,
तुम्हारी खुशी में ही अपनी खुशी पाई।
खुद के लिए जीना छोड़ कर,
तुम्हारे लिए जीने की कसम खायी।
तुम्हारे कदमों के निशान पर चली,
बनकर तुम्हारी जीवन संगिनी।
समा गई हूँ तुझमें ऐसे 
जैसे स्वरों में समाई हो रागिनी।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"