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नील गगन को छू कर आऊ---
चंचल चितवन कहलाता है,
कभी हो जाता पंख पखेरू,
कभी मृगतृष्णा बन जाता है,
कहां ढूंढ रहा मन कस्तूरी,
आखिर क्या तेरी मजबूरी, 
क्यों व्याकुल हो जाता है,
कैसा है ये मोह का बंधन,
मन समझ नहीं पाता है,
अंतर्मन में झांक के देखो---
हर प्रश्न का हल मिल जाता है,
काम क्रोध और लोभ मोक्ष---
मन को भ्रमित कर जाता है,
मन हल्का करके तो देख,
शुद्ध विचारों का आलिंगन---
एक रोज करके तो देख,
ऊंची उड़ान भर जाएगा---
आसमान को छू जाएगा,


     संगीता वर्मा ✍️✍️