**************************************





शहर बदलते ही बदल जाता है,
इसी चाय का जायका अक़्सर।

इंसानों कीतो क्याबात करनी है,
उनको पल पल बदलते देखा है।

जब तलक काम हो कोई उनका,
आपमें ही भगवान नज़र आते हैं।

थोड़ा इंतज़ार करो काम हो जाये,
बदला-2 ये इंसान नज़र आ जाये।

यह भी देखा है कभी-2 या अक्सर,
इंसान पहचानने से भी कतराता है।

यही तो है दुनिया का दस्तूर पुराना,
वक्त वेवक्त जमाना बदल जाता है।

ज़माने से कोई नहीं शिक़ायत मेरी,
यहाँ हर एक इंसान बदल जाता है।

कौन पूछता है ये भला कभी उसको,
पत्थर गढ़ जो भगवान बना देता है।

पत्थर पूजो गे सभी मंदिर में जाकर,
पड़ोसी भूखा है पूछें न कभी जाकर।

यही तो हाल है इस बेदर्द ज़माने का,
समय-2 पे हर इंसान बदल जाता है।


रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
.