हां मैं बहुवर्षीय पेङ हूं। 
दूर -दूर खङा हूं••••
पर जङो में एक-दूसरे से बंधा हूं। 
नहीं जाता एक-दूसरे को छोङकर;
हर कठिनाई में अङा हूं;

श्रेष्ठता के दंभ नहीं भरता;
पर एक-दूसरे को थामे हूं। 
हां मैं पेङ हूं;
दूर-दूर  खङा हूं;
पर जमीन के अंतःस्थल में 
एक-दूसरे से जुङा हूं। 

जिस  जमीन में उगा;
उसको धनी करता;
हर विपदा से लङा हूं। 
मुझे गर्व है कि मैं फलता-फूलता हूं ~
हर साल अपने अनेको 
पर्ण खोकर भी
पुनः हरा -भरा हूं~
हां मैं पेङ हूं।

जङो में कितने सूक्ष्म-जीवों को
जोङे,,,
दूसरे पेङो को भी गिरने से  बचाता 
अपनी मिट्टी को ही धनी करता हूं। 

नहीं जाता कहीं छोङकर !
बाढ,,,सूखा,,,,अतिवृष्टि हो
अकाल,,,,या ओला पङे!!

धैर्य को शाखाओं में समेटे;
हर सुबह नव-किरणों का 
आलिंगन करता
अपने विस्तार में झूमता हूं!!

हां मैं अनेको वर्षों से खङा
पीपल••••बरगद••••कदम्ब 
का बहुवर्षीय पेङ हूं। 

निज-विस्तार से आह्लादित ~
खगों के कलरव सुन आत्मविभोर 
होता,,,,अपनी गरिमामय उपस्थिति 
से युक्त शोभायमान बहुवर्षीय पेङ हूं। 

                         ✍  डाॅ पल्लवी कुमारी"पाम