चारों तरफ अंधेरा है
आफरा तफरी का मेला है
भय भयाक्रांत समाज 
अंधेरों में खोया है।।
मुट्ठी भर रौशनी की आशा
शायद हो जाये उजियार 
मील जाए राहत बचा अभी
विश्वास है।।
अविश्वास वेदना का अंधेरा
संसय में जन जन जीवन
भटकता जूझता अस्तित्व
के लिये करता हाहाकार।।
आहत मानवता निराश
ईश्वर को करे पुकार
बैठा देवालय में अधरों
पर बांसुरी मुस्कान 
शेष नाग के फन छीर
सागर में निश्चित प्राणि
को मिल जाएगा स्वयं सिद्ध
का आधार ।।
महाप्रलय का अंधेरा
जाएगा फिर आएगा
माहाकाल चंद्र मौली
मुठ्ठी भर रौशनी आस्था
महाप्रलय की निशा मध्य
चंद्र का प्रादुर्भाव।।
आएगा नव प्रभात
ब्रह्ममुहूर्त की बेला
ब्रह्म दिवस का शुभारंभ
प्रथम देव सूर्य की लाली
किरणे मुठ्ठी भर रौशनी
आशा का सांचार।।
छंट जाएगा अंधेरा
उदित उदय अम्बर पर
नव उत्साह का शौर्य सूर्य
मुट्ठी भर रौशनी के अन्तर्मन
का परम प्रकाश।।
नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीतांम्बर
 गोरखपुर उत्तर प्रदेश