मनुष्य का मन अच्छाई और बुराई दोनों का संगम होता है। उसमें राम भी रहते हैं और रावण भी। कभी वही भगवान बन जाता है तो कभी वही शैतान। लगता है कि जो पुराणों में देवासुर संग्राम का उल्लेख है, वह कुछ प्रतीकात्मक है। शायद मन के विचारों को ही देव और असुर कहा है। जिनके बीच लगातार जंग जारी रहती है। कभी देवता दैत्यों पर हावी होते हैं। तो कभी दैत्य अपना प्रभाव जमाने लगते हैं। फिर आत्मतत्व ही वह तत्व है जो असुरों पर देवों का बर्चस्व स्थापित करता है।बुराई पर अच्छाई को विजेता बनाता है। 

   जिस ज्ञान को आत्मतत्व कहा जाता है, वास्तव में शायद वह परमार्थ तत्व है। बताया यही जाता है कि आत्मा को जो समझ लेता है, वह खुद के सुख दुखों की परवाह नहीं करता। वह पूरे विश्व का प्रेमी बन जाता है। 

   इन बातों पर बहुत विचार इसलिये आ रहा है क्योंकि जो विशाल उस दिन काफी शाप में लक्ष्मी को उसके प्रेमी से मिलाने का संकल्प ले रहा था, आज वह खुशी खुशी अपने विवाह में चलने की तैयारी कर रहा है। घर में उत्सव का माहौल है। अनेकों रिश्तेदारों की भीड़ लगी हुई है। पंडित जी पूजा अनुष्ठान में व्यस्त हैं। रिश्ते की कई बहनें भाई से अपनी मनपसंद मांग कर रही हैं। आज उनका भाई उनके लिये भाभी लेने जा रहा है। सुना है कि भाभी एकदम चांद जैसी सुंदर हैं। विशाल मुस्कराते हुए सभी को मना रहा है। 

  " अब हटो लड़कियों। भाई को भी तैयार हो जाने दो। खुद भी तैयार हो जाओ। आखिर तुम सबको भी तो बरात में चलना है।" 

  एक बुजुर्ग महिला जो निश्चित ही विशाल की कोई खास रिश्तेदार थी, उसने लड़कियों को विशाल से अलग किया। लड़कियां भी खुशी खुशी तैयार होने चली गयीं। 

   विभिन्न परंपराओं का निर्वहन करते करते सुबह से शाम हो गयी। बरात भी शहर में ही जा रही थी। तो कोई जल्दी नहीं थी। शाम के समय पंडित जी के मंत्रोच्चार व बैड बाजों की ध्वनि के साथ विशाल की निकरौसी की गयी। घर के नजदीक के मंदिर पर विशाल ने पूजा की। आज वह अपने आराध्य से क्या मांग रहा हैं। इसे समझा नहीं जा सकता। 

  उस दिन जिस तरह से विशाल ने लक्ष्मी और उसके प्रेमी को मिलाने की प्रतिज्ञा की थी, उस हिसाब से उसने अभी तक कुछ नहीं किया। उसे अपने स्तर से लक्ष्मी के प्रेमी का पता करना चाहिये था। उसे खुद लक्ष्मी से इस बाबत बात करनी चाहिये थी। कुछ नहीं तो अपने माता पिता को स्पष्ट कह देना चाहिये था कि यह विवाह मैं नहीं कर सकता। पर ऐसा कुछ न कर वह लक्ष्मी से शादी करने जा रहा है। किसी के भी मन को दूसरा कौन पढ सकता है। जिस तरह का आचरण विशाल कर रहा है, उससे तो यही माना जा सकता है कि उसनै अपने प्रण को भुला दिया है। वैसे भी त्याग और बलिदान जैसी बातें इतनी आसान नहीं होतीं। हालांकि संस्कारी लोग ऐसे उच्च आदर्शों को जीवन में उतारने की कोशिश जरूर करते हैं। पर अक्सर मन की दुर्बलता हावी हो जाती है। 

   एक क्षण के लिये मन में उठे उच्च विचार परिस्थितियां बदलते ही मन से दूर हो जाते हैं। किसी प्रियजन के देहांत पर अंतिम संस्कार में श्यमशानघाट पर मौजूद सभी के मन में संसार से वैराग्य की भावना होती है। पर वह भावना टिकती कितनों के मन में है। ज्यादातर तो चिता की अग्नि ठंडी होने से पूर्व इस तरह के श्यमशान वैराग्य का जोश ठंडा हो जाता है। जब एक प्रेमी अपनी प्रेमिका की आंखों में उसका सुख तलाश रहा था, तब की और बात थी। पर उससे अलग होते ही बदल जाना कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है। 

  विभिन्न अच्छाइयों में एक अच्छाई है आशा। आशा वह है जो मुर्दों में भी प्राण डाल दे। आशा वह है जो हारे हुए को जिता दे। आशा वह है जो गिरते हुए को उठा दे। भले ही विशाल के व्यवहार से तो यह माना नहीं जा सकता कि उसके मन में उस दिन जैसी कोई उच्चता आज भी जीवित है। फिर भी आशा की जा सकती है कि जो दिख रहा है, वह झूठ है। आशा की जा सकती है कि देव इस तरह असुर नहीं बन सकता। आशा की जा सकती है कि आज भी एक प्रेमी अपने प्रेम की उच्चता पर स्थित है। आशा की जा सकती है कि शायद एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका की खुशियों को ढूंढ लिया है तथा आज वह इतने शान के साथ दुनिया के सामने अपनी प्रेमिका को उसकी खुशियां उपहार में देने जा रहा है। आशा की जा सकती है कि इस समय भी विशाल अपने आराध्य से यही प्रार्थना कर रहा है कि वह कमजोर न पड़े। जब वह अपनी प्रेमिका के लिये अपना प्रेम भी त्यागने जाये, उस समय उसकी आंखों से खुशी के ही आंसू निकलें। 

   आज विशाल ने अपने खास दोस्त संकल्प को पूरे बक्त अपने साथ रहने के लिये बोला है। संकल्प को अच्छे कपड़े पहनाये गये हैं। आज वह किसी गाड़ी का ड्राइवर नहीं बल्कि दूल्हे का खास दोस्त बनकर उसी की गाड़ी में उसके साथ जा रहा है। मित्रता भी अजीब परीक्षा लेती है। कहाॅ आज संकल्प जरा दूरी चाह रहा था ताकि आंखों से निकलते आंसुओं को चुपचाप पोंछ सके। पर मित्र ने इस तरह बाध्य कर दिया कि वह आंसू भी नहीं बहा सकता है। 

   शादी की व्यवस्था लक्ष्मी के घर के नजदीक ही एक बड़े बरातघर में की गयी है । दोनों ही पक्षों के अनेकों परिचित विवाह समारोह में उपस्थित है। विवाह की तैयारियों का जिक्र करना ज्यादा ठीक नहीं है। दोनों ही पक्ष शहर के धनाढ्य लोग हैं तो तैयारियों में कमी का प्रश्न ही नहीं उठता। 

  बारात का नाश्ता, घुडचढी के बाद आखिर जयमाला का समय आ गया। हिंदू नियमों के अनुसार जब वर और बधू अग्नि के सात फेरे लेते हैं तब उनका विवाह संपन्न होता है। जयमाला का आयोजन कुछ स्वयंवर प्रथा का प्रतीक है जिसमें कन्या जयमाला डालकर अपने वर का चयन करती थी। दुल्हन के वेष में लक्ष्मी बहुत ही सुंदर लग रही है । आसमान में हलके हलके बादल हो रहे हैं। आज चांद बादलों में छिपा है। लगता है कि वह भी लक्ष्मी की सुंदरता देख ईर्ष्या में जल भुन बादलो के पीछे चला गया है। वहीं से कभी कभी अपना मुंह दिखा जाता है। 

   लक्ष्मी के साथ उसकी दोनों सहेलियाँ रिचा और साधना हैं। तो विशाल के साथ उसका मित्र संकल्प खड़ा है। इस समय लक्ष्मी और संकल्प दोनों का ही मन बैचेन है। जिनको दोनों अपने स्वप्नों में देखते आये हैं, आज उन्ही के सामने एक दूसरे से दूर होंगे। दोनों की परीक्षा की घड़ी है। दोनों ही अपने इष्ट को याद कर रहे हैं। 

   बजते हुए गाने एक पल को रुके। फिर जयमाला के लिये मशहूर गाना बजने लगा। 

  " बहारों फूल बरसाओ , मेरा महबूब आया है।" 

संकल्प और विशाल दोनों सामने से अपने महबूब को आते देख रहे हैं। दोनों का ही मन इस समय रोने को हो रहा है। लक्ष्मी भी इस समय रोना चाहती है पर किसी तरह खुद को रोके हुए है। जैसे ही उसने विशाल के गले में माला डालनी चाही, विशाल पीछे हट गया। उपस्थित जन समुदाय के लिये यह केवल हास्य की बात है। जयमाला के अवसर पर इस तरह की नोकझोंक आजकल बहुत होती है। दूल्हा और दुल्हन दोनों ही एक दूसरे को कुछ परेशान सा करते हैं। कई बार दूल्हे को उसके दोस्त कंधे पर भी उठा लेते हैं। कुछ ऐसी ही कल्पना सभी के मन में है। पर यथार्थ कुछ अलग है। आज इसी समय विशाल अपने प्रेम के लिये वह त्याग करेगा जो अच्छे अच्छों के वश की बात नहीं है। 

    कुछ देर विशाल का यह खेल चलता रहा। आखिर लक्ष्मी भी तंग आ गयी। विशाल से पुरानी दोस्ती है। तो ज्यादा झिझक की तो बात है नहीं। 

  " अब कब तक यह नाटक चलेगा। इतने समय की दोस्ती में तो कभी इस तरह नहीं देखा। हमेशा मेरी समस्याओं को सुलझाया है।" 

   " हाॅ ।पर अब वह दोस्ती कहाॅ। दोस्त भी खुद को कहते हैं पर दोस्त से छिपाते भी बहुत हैं।" विशाल ने बोलना शुरू किया। माहौल एकदम शांत हो गया। गाने बंद हो गये। 

" यह तुम क्या बोल रहे हों। " लक्ष्मी को अभी तक पूरी बात समझ नहीं आयी। उसने अपने मन की बात किसी को भी नहीं बतायी थी। उसे अनुमान भी नहीं था कि उसके मन की बात कुछ लोगों को पता है। 

" हाॅ तो लक्ष्मी। हाॅ भाई संकल्प। दोनों मुझे दोस्त मानते हों। फिर दोनों ने मुझसे सब छिपाया। सच बताओ संकल्प। क्या तुम लक्ष्मी को पसंद नहीं करते। और लक्ष्मी तुम भी। क्या संकल्प के बिना तुम खुश रह पाओंगी। अच्छा रहा कि उस दिन तुम्हारी आंखों को देख समझ गया। यह भी अच्छा रहा की मुझे सब सच पता चल गया। नहीं तो अपने दो दोस्तों की खुशियां मेरे ही कारण मिट जाती। तुम दोनों ने यह अच्छा नहीं किया। "

   जनसमुदाय से सुदर्शन, सुलक्षणा और नामदेव सामने आ गये। सुलक्षणा ने लक्ष्मी के कंधे पर हाथ रख दिया। 

" लक्ष्मी। एक बेटी सभी से मन की बात छिपा सकती है। पर अपनी माॅ से कभी नहीं। यह तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम्हारी असली माॅ जिसने तुम्हें जन्म दिया है, वह सब जान गयी। हमें तो तुम्हारी खुशियां चाहिये। जब तुमने हमें कुछ नहीं बताया तो हमने भी तुमसे कुछ छिपाव किया। तुम्हारा विवाह संकल्प के साथ ही होगा। इसके लिये दो ही लोग जिम्मेदार हैं। एक तुम्हारा सच्चा दोस्त विशाल और एक तुम्हारी माॅ। आओ आज तुम्हें तुम्हारी माॅ से मिलाती हूं। उपस्थित सभी को पता चलना चाहिये कि तुम्हारी माॅ कितनी बड़ी है। उसने हमारी खुशियों के लिये तुम्हें, अपनी इकलौती संतान को हमें सोंप दिया। "

  सुलक्षणा लक्ष्मी का हाथ पकड़ लोगों की भीड़ में ले गयी। सामने एक महिला को देख लक्ष्मी थोड़ा रुकी फिर माॅ बोलकर उसके गले लग गयी। 

  कहावत" शव्दों से क्या होता है " एकदम गलत प्रतीत होती है। शव्द बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। माता गंगा से निकली नहर का जल गंगाजल नहीं होता। तथा गंगा जी में एक लोटा पानी कूए का चढा देने पर वह भी गंगाजल बन जाता है। रुक्मिणी हमेशा वकील साहब के घर काम करती आयी है। उसी ने लक्ष्मी का पालन पोषण किया है। हमेशा लक्ष्मी को बधाई देने का प्रथम अधिकार उसी को मिला है। हमेशा रुक्मिणी के दिये उपहार को लक्ष्मी वरीयता देती आयी है। फिर भी उसके मुंह से माॅ सुनने से रुक्मिणी के मन में जो खुशी हुई, उसका कैसे वर्णन किया जा सकता है। शुभ अवसर पर आंसू नहीं बहाते। लगता है कि इस अवसर पर अनेकों के नैत्र आंसू बहाना चाहते है। पर सभी खुद को रोक रहे हैं। आसमान से हलकी हलकी बूंदाबांदी शुरू हुई। थोड़ी ही देर में मूसलाधार पानी बरसने लगा। मानों सभी के बदले का रोना खुद प्रकृति देवी कर रही हों। आज भी प्रेम में लोग त्याग करते हैं। चाहे वह विशाल हो, संकल्प, लक्ष्मी या रुक्मिणी। प्रेम त्याग से शुरू होता है और उसकी परिणति भी त्याग ही होती है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'