है जीतता खेल में कोई ,
खेल में कोई हारता है
पर सत्य विजेता है वही जो,
अपने प्रदर्शन पे सबकुछ वारता हैl
न होता जिसे जय का मोह ,
दुःख पराजय का न जिसे विचलित करता
प्रयत्न में रत रहे हरपल,
असफलता से उद्विग्न न चित्त करता l
साहस उसे सँवारता है,
युग,कर्तव्य, उत्तरदायित्व और पौरुष उसे पुकारता है
प्रतिकूलता से डरता वो नहीं,
बस अनुकूलता को स्वीकारता है l
अपने विवेक के प्रकाश का कर अवलंबन
वो स्वयं आगे बढ़े
कौन विरोध करता है, कौन समर्थन,
इसकी गणना कौन करें?
जब भी कभी हार का भय
आकर उसे सतायेगा
अपना दृष्टिकोण बदलेगा ज्यों ही, दूसरे ही क्षण
वह भय का भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जायेगाl
लोभ,मोह,मद दबाव के झोंके
उसे नहीं भटकायेंगे,
भीतर उगा था जब श्रद्धा का अंकुर
खुद को उसी मनःस्थिति में जब ध्यायेंगे
किसी की आपत्ति से, कहने - सुनने से
आत्म विश्वास न जिसका डगमग होगा
आत्म श्रद्धा कायम कर बढ़ेगा जो निरंतर,
चढ़ेगा देर या सवेर,किसी एक दिन वही स्वप्न सौपान
हेतु जिसके समस्त संसार स्वतः रास्ता देगाl
-निगम झा
उप- निरीक्षक, स. सी. बल
सिलीगुड़ी
(मैंने यह कविता मेरे मित्र व प्रसिद्ध भाला फेंक खिलाड़ी शिवपाल सिंह जी को समर्पित की है जो अभी टोक्यो ओलंपिक की तैयारी में लगे हैl)

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