दुश्यंत को जब पता चला कि उसकी शादी सुनंदा से होने जा रही है तो मन में एक अबूझ खुशी महसूस हुई। दुश्यंत समझ ही नहीं पा रहा था कि इस खुशी की बजह क्या है। इतने सालों में वह सुनंदा को थोड़ा भूल भी गया था। फिर दोनों साथ रहे भी कितने दिन थे। पर जब उसकी शादी के लिये रिश्ते आने लगे तो वह मन ही मन बैचेन होने लगा। जिसकी बजह भी शायद उसे पता न थी। 

    अक्सर उसके पिता उससे फोन पर रिश्तों के बारे में बताते। उससे पूछते भी। पर दुश्यंत को कोई भी लड़की पसंद न आती। 
आखिर विशाल भी परेशान हो गये। एक दिन तो उसपर गुस्सा भी हो गये। अगर तेरे मन में ही कोई लड़की है, तो उसे बता दे। आखिर सच भी तो पता चलना चाहिये। 

  पर दुश्यंत कुछ भी नहीं बता पाता। वास्तव में वह समझ ही नहीं पा रहा था कि वह क्या चाह रहा है। 

  जब उनकी ताई ने सुनंदा के रिश्ते की बात चलायी तो सुनंदा के भाई न होने के कारण विशाल जी ने तो मना कर दिया। पर राधा जी ने फिर बात समझायी। अभी तक तो लड़का किसी भी लड़की से संतुष्ट नहीं हुआ। एक बार इस बारे में भी पूछ लो।

   दुश्यंत को जब बताया गया तो उसे लगा कि शायद यही वह है जो उसकी होनी चाहिये। शायद इसी को वह अपनी जीवन संगनी चाहता है। शायद वह अज्ञात चाहत यही थी। 

    दुश्यंत ने अपनी तरफ से तो बात बढाने के लिये हाॅ कर दी। पर जब बहुत दिनों तक न तो पापा ने और न मम्मी ने आगे कुछ बताया तो उसे चिंता होने लगी। 

   आखिर क्या बात है। कहीं सुनंदा के पिता आये ही न हों। आखिर लड़की भी पी एच डी कर रही है। उसके लिये रिश्तों की क्या कमी। या फिर वे आये हों। और बात ही न बनी हो। सबकी अपनी अपनी सोच होती है। हो सकता है कि ताई के जोर देने पर पापा ने हाॅ कर दी हो। पर फिर मना कर दिया हो। आखिर वह भी ऐसी लड़की चाहते हैं जिसके कोई भाई हो। और एक विचार सबसे ज्यादा परेशान करता। संभव है कि लड़की ने ही रिश्ता करने से मना कर दिया हो। अब लड़कियां भी अपनी राय खुलकर देती हैं। संभव है कि उसे कोई अन्य लड़का पसंद हो। 

   दुश्यंत हर रोज विचारों के झंझावात में उलझता रहता। अनेकों बार लगता कि इसमें परेशान होने की क्या बात है। जो भी बात होगी, पापा बता देंगें। यदि कोई बात न बनी तो बताने की भी क्या जरूरत। 

  पर दुश्यंत को लगने लगा कि अब कोई तो बात है। आज तक इस तरह से कभी भी नहीं सोचा था। पर अब सोचने लगा। लगता है कि शायद वह उस प्रेम नामक बीमारी से त्रस्त है जिसने मजनू, रांझा समेत अनेकों को अपनी गिरफ्त में लिया था। 

   दुश्यंत को ईश्वर पर आस्था थी। पर बचपन से ही वह पूजा पाठ से दूर रहता था। वैसे कर्म करना भी पूजा है। आज तक कभी भी उसने स्नान करके पांच मिनट के लिये भी ईश्वर को याद नहीं किया था। कभी भी भगवान के सामने दीपक नहीं जलाया था। घर पर ये सारे काम मम्मी और छोटी बहन करते थे। 

   आर्मी परिसर के मंदिर में अब दुश्यंत रोज हाजरी देता। जितना वह जानता, उस हिसाब से आराधना करता। हनुमान चालीसा की पुस्तक खरीद लाया था। पर उसे पढने में भी अशुद्धियां कर देता। पर पढता जरूर। कुछ ही दिनों में वह हनुमान चालीसा का शुद्ध पाठ करने लगा। 

   ईश्वर के घर देर हो सकती है। पर अंधेर नहीं। एक दिन पिता ने फोन कर बताया कि सुनंदा को देखने का प्रोग्राम बना रहे हैं। छुट्टी लेकर तुम भी आ जाओ। तुम्हारे साथ ही चलेंगे। आखिर तुम भी सब समझ लो। आखिर तुम्हारी जिंदगी की बात है। 

  दुश्यंत को ऐसी खुशी हुई जिसे लिखा नहीं जा सकता है। यदि पिता जी खुद व खुद रिश्ता तय कर देते तो भी उसे परेशानी न होती। आखिर उसने पंद्रह दिन की छुट्टी का आवेदन किया। छुट्टियां मिल गयीं। दुश्यंत को एक एक दिन काटना मुश्किल हो रहा था।

  आखिर वह घर चल दिया। रास्ते भर सुनंदा के विषय में सोचता रहा। घर पहुंचने से पहले ताऊ और ताई के घर पहुंचा। 

   " अरे। आ गया बेटा।" सत्यवती ने उसे आशीर्वाद दिया। 

  " हाॅ ताई।" 

  दुश्यंत सोचता रहा कि ताई कुछ बात बताएंगी। पर ताई ने कुछ न बताया। चाय नाश्ता कराया। पर दुश्यंत को सुनंदा की फोटो भी देखने को न मिली। 

  घर पर भी वही हाल थे। लड़की देखने चलना है, तो ठीक है। पर उससे पहले घर पर भी कुछ बात बतायी जाती हैं। फोटो बगैरह दिखाया जाता है। ऐसा कुछ नहीं हो रहा। 

  मौका देखकर दुश्यंत घर में सुनंदा का फोटो तलाशने लगा। पर सफलता न मिली। 

  अब इंतजार के अलावा कोई चारा नहीं है। वैसे इंतजार की अग्नि में तपकर ही प्रेम रूपी स्वर्ण निखरता है। आखिर वह दिन आ ही गया। जब दुश्यंत अपनी महबूबा का दीदार करेगा। 

  मम्मी, पापा, बहन, ताऊ और ताई सभी के साथ दुश्यंत सुनंदा को देखने चल दिया। आज उसे गाड़ी की रफ्तार ज्यादा कम लग रही थी। एक एक पल मुश्किल से गुजर रहे थे। इसी तरह वह सुनंदा के घर पहुंचा। अब उसे एक पल का इंतजार भी मुश्किल लग रहा था। पर फिर भी उसने अपनी भावनाओं पर काबू रखा। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'