कुदरत का है निज़ाम अनोखा
 कहीं है बारिश कहीं है सूखा 
कहीं फुलवारी कहीं पतझड़ है  
कहीं सूखे मौसम की गड़बड़ है

कहीं मन है सूखा 
कहीं तन है सूखा 
कहीं किसी का भरा पेट है 
कहीं कोई है बिल्कुल भूखा 
कुदरत का है निज़ाम अनोखा

कहीं हंसी है
 कहीं ख़ुशी है 
कहीं किसी का मिजाज नरम है 
कहीं किसी का वाणी है रुखा 
कुदरत का है निज़ाम अनोखा

कहीं पाप है 
कहीं पुण्य है 
कही मोहब्बत के अफसाने है 
कहीं कोई दे रहा किसी को धोखा  
कुदरत का है निज़ाम अनोखा

कहीं दाल है कहीं भात है
कहीं अलग अलग व्यंजन का स्वाद है  
कहीं मिलता उबला सा भोजन 
कहीं मिल रहा लिट्टी चोखा 
कुदरत का है निज़ाम अनोखा

आपका मुकेश लखनवी