वह शरद ऋतु आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी थी।भैरवघाटी के बाहर लगे शिविरों में काफी हलचल मची हुई थी। सदियों से जिस क्षेत्र की ओर मनुष्य के पदचाप नहीं पड़ते थे, वहाँ आज सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी थी। सरकार ने कठोर निगरानी रखी ताकि कोई भैरवघाटी की ओर न जा सके। महायज्ञ की तैयारी पूरी हो चुकी थी।  स्वामी स्वरुपानंद पुजारी गिरिजाशंकर को आवश्यक निर्देश दे रहे थे। कृष्णा, कावेरी , तुंगभद्रा, भीमा,हेमवती, घटप्रभा,वाराही,गंगावली,पेन्ना, सीता,शांभवी,पयस्विनी,चित्रावती, मार्कंडेय, कुमारधारा  और लक्ष्मणधारा आदि सभी पवित्र नदियों से कलशों में जल भरकर लाया गया। तभी एक तेजस्वी साधु का प्रवेश हुआ। वे ऋषिकेश के पहाड़ी गुफा में तपस्या में लीन रहनेवाले स्वामी चिद्घनानंद थे। अनिरुद्घ ने स्वामी चिद्घनानंद को साष्टांग प्रणाम किया। अन्य सभी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किये। अब स्वामी चिद्घनानंद निर्देश देने लगे। उन्होंने पवित्र नदियों से लाये जल को एक बड़े पात्र में डलवाकर उसमें हाथ डालकर अभिमंत्रित किया। फिर पुजारियों द्वारा उसे कंटीले तारों से घिरी उस प्रदेश में चारों तरफ छिड़काव करवा दिया। सभी को उस  बतार के बेबड़े के बाहर रहने को कहा। स्वामीजी ने अपने दंड से उन
कंटीले तारों को स्पर्श किया तो वे सभी तार गायब हो गये। स्वामी चिद्घनानंद जी आगे बढ़े ,पाँच फनवाले दो बड़े नाग फुफकारते हुए उनकी ओर बढ़े। लोगों में भय व्याप्त हो गया। स्वामीजी ने कमंडलु से जल हाथ में लेकर उन पर छिड़का। वे दोनों नाग तुरंत अदृश्य हो गये। स्वामी चिद्घनानंद जी के पीछे स्वामी स्वरुपानंद, पुजारी गिरिजाशंकर और अन्य पुजारी पूर्ण कलश के साथ स्वस्तिवाचन और वेदमंत्रों के घोष करते हुए आगे बढ़े। उनके पीछे भानुप्रताप और उनका परिवार और  चंद्रभान और उनके परिवार चलने लगे। अन्य सभी को वहीं बाहर बने मंडप में ही रुकने का निर्देश दिया गया।  सभी वेदमंत्रों के उच्चार के बीच  उस शिथिल भैरव मंदिर की ओर बढ़े। जैसे ही वेदघोष आरंभ हुआ,तभी विकराल हँसी और चील की कर्णभेदी आवाजें गूंजने लगी। ज्यों ज्यों वेदघोष ऊंचा होता गया वे चीखें तेज होती गई। स्वामी चिद्घनानंद जोर से चीखे दूर हटो ,नहीं तो सभी को भस्म कर दूंगा। क्षण भर में सब शांत हो गया। भैरव मंदिर  के पीछे बावड़ी से जल लाकर रामदुलारी देवी और मेनका देवी ने सफाई की । वहाँ पड़े कपाल और टूटे फूटे मिट्टी के पात्र और दीपक आदि भानुप्रताप और चंद्रभान ने दूर  फेंक दी।
भैरव मंदिर  के पीछे बावड़ी से जल लाकर रामदुलारी देवी और मेनका देवी ने मंदिर की सफाई की। मंदिर  के सामने यज्ञकुंड बनाया गया और वहाँ पर महामृत्युंजय होम आरंभ हुआ। स्वामी चिद्घनानंद ऋत्विक के आसन पर विराजमान हुये। फिर उन्होंने वेदोक्त प्रकार से यज्ञकरते रहे। स्वामी स्वरूपानंद भी मंत्रोच्चार करने लगे । बड़ा पवित्र वातावरण छा गया। तभी कालभैरव का वाहन कुत्ता  निजरूप में बटुकदास बनकर प्रत्यक्ष हुआ।  स्वामी स्वरूपानंद ने अनिरुद्ध और प्रियंवदा को संकेत किया। वे दोनों बटुकदास के साथ आगे उसपत्थर की दीवार से घिरा भैरवघाटी की ओर प्रस्थान किये। जैसे ही वे उस.बड़े फाटक के पास पहुंचे दो विशाल सर्प उन्हें डसने आगे बढ़े। तुरंत बटुकदास ने अपने हाथ घुमाकर त्रिशूल प्रकट कर उसे उनकी ओर फेंक दिया। वे दोनों सर्प अदृश्य हो गये और तीनों आगे बढ़े। प्रियंवदा के हाथ में एक कलश था जिसमें स्वामीजी द्वारा अभिमंत्रित पवित्र नदियों का जल था। वह उसे चारों ओर छिड़कने लगी। जैसे ही वह अभिमंत्रित जल छिड़कने लगी, भयंकर चीखें और रोदन की आवाजें आने लगी। बटुकदास ने बताया कि उस दुष्ट कर्कोटक मांत्रिक ने इन नगरवासियों के मृत आत्माओं को कैद कर रखा था।उन आत्माओं को इस वेदोच्चार और पवित्र अभिमंत्रित जल से डर लगता है। अतः वे प्रेतात्माएं चीख रही हैं।पर घबराओ नहीं तुम जल का छिड़काव करती जाओ। प्रियंवदा वैसे ही करने लगी। इतने में आकाश में काले बादल छा गये और पत्थरों की बारिश होने लगी। बटुक ने फिर त्रिशूल प्रकट टर उन बादलों की तरफ फेंक दिया। एक कर्णभेदी चीख के साथ एक विशालकाय प्रेत नीचे गिरकर प्राण त्याग दिया। एक ज्योति आकाशकी ओर चली गई और वह मृत देह गायब हो गया। अनिरुद्ध प्रियंवदा के हाथ से कलश लेकर प्रोक्षण आरंभ किया। तभी एक विशाल उल्लू कहीं से आया और वह कलश झपट लेनेवाला था।अनिरुद्घ ने स्वामी चिद्घनानंद के दिये अपने हाथ की अंगूठी को उस उल्लू की दिशा में घुमा दिया ।एक अग्निकिरण निकलकर ऊस उल्लू को भस्म कर दिया। वे तीनों गौरी मंदिर के पास पहुंचे। तभी आकाशवाणी सुनाई दी-"वत्स अनिरुद्ध और बेटी प्रियंवदा तुम दोनों इस सरोवर में स्नान करो, तुम्हें दिव्य शक्ति प्राप्त होगी। "
प्रियंवदा और अनिरुद्ध उस सरोवर में उतरे। तभी एक मगरमच्छ अनिरुद्ध को गर्दन से  पकड़ लिया । तुरंत प्रियंवदा ने हाथ से गौरी माता के दिये कंगन निकाली और उस मगरमच्छ पर फेंक दी। वह कंगन एक त्रिशूल बनकर मगरमच्छ का सिर काट डाला । एक तेज चीख हवा मे गूँज गई और मगरमच्छ गायब हो गया। वे दोनों सरोवर में स्नानकर निकले। सरोवर के जल में जब वे अपना प्रतिबिंब देखे तो वे अपने को एक राजकुमार और राजकुमारी के रूप में दिखे। बाहर आकर वे सरोवर के पास खड़े ही थे कि एक शेर दहाड़ते हुए प्रियंवदा की ओर बढ़ा। वह गले में पड़े  रुद्राक्ष माला को हाथ से पकड़कर माता गौरी का स्मरण की। तब कहीं से एक त्रिशूल आग उगलता हुआ उस शेर की ओर बढ़ख और उसको मार गिराया। वे अब  गौरी मंदिर की ओर बढ़े ही थे कि एक विशालकाय काला बैल इनकी ओर दौड़ा। इस बार अनिरुद्घ स्वामी स्वरूपानंद के दिये हुये रुद्राक्ष माला को हाथ से छूकर स्वामीजी का स्मरण किया। तभी गौरी मंदिर के अंदर से एक बड़ा सफेद बैल भयंकर गर्जना करते बाहर निकला और उस.कालेक्षबैल पर वार कर दिया। उसे अपने सींगों से मार मार कर घायल कर दिया। वह खून की उल्टी करते हुए भयंकर आवाज से रंभाते हुए मर गया। अंतँः वे गौरी मंदिर मे जाकर प्रणाम कर फिर पास में ही स्थित शिव मंदिर में भी जाकर दर्शन कर बाहर निकले। बटुकदास उन्हें लेकर आगे बढ रहा था कि घनघोर अंधेरा छा गया. पत्थरों की बारिश होने लगी ।बटुकदास ने त्रिशूल उठाकर सवा में फेंका। सभी बादल छँट गये और एक राक्षसाकार चील आकर प्रियंवदा को अपने चंगुल में फंसाकर आसमान में उड़ चला।  बटुकदास ने अनिरुद्ध को सावधान करते कहा -"अनिरुद्ध  यही वह मायावी मांत्रिक है। तुम तुरंत स्वामी चिद्घनानंद जी के दिये अंगूठी को निकालकर "ऊँ नमः शिवाय "का जाप करते हुए उस ओर फें दो ,नहीं तो प्रियंवदा को छुड़ा नहीं पाओगे। " अनिरुद्ध उस अंगूठी को उस चील की तरफ "ऊँनमः शिवाय" का जाप करते हुए फेंक दिया। वह अंगूठी एक त्रिशूलं में परिवर्तित होकर आग उगलते हुए उस चील के गर्दन को काट डाला। वह चील भयंकर आवाज में चीखा और नीचे गीगिरने लगा। वह अंगूठी फिर अनिरुद्ध के हाथ में आ गया। चील के पंजे से छूटकर प्रियंवदा नीचे धरती की ओर तेजी से गिरने लगी। तभी शिवजी के मंदिर से भृंगी एक बैल का रूप धरकर आका में उड़ा और प्रियंवदा को अपनी पीठ पर बैठाकर नीचे आ गया।  वह चील नीचे गिरकर भयंकर आवाज में क्रंदन करने लगा। वह अपनेनिजरूप में आ गया। लाल लाल आंखैंं लंबी भद्दी नाक मटके जैसा मुँह आदि से उसका अति भयंकर रूप था। उसके नाक ,और मुँह से रक्तबह रहा था। वह तड़प तड़प कर भयंकर गर्जना करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसके मरते ही उस घाटी से उसकी माया लुप्त हो गई।
   इतने में भैरव मंदिर में मृत्युंजय होम पूर्ण कर स्वामी चिद्घनानंद और स्वामी स्वरूपानंद सभी पुजारियों और भानुप्रताप और रामदुलारी तथा चंद्रभान और मेनका देवी को साथ लेकर पधारे। पुजारियों ने अभिमंत्रित जल का चारों ओर प्रोक्षण किया। मांत्रिक कर्कोटक के मृत देह पर .स्वामी चिद्घनानंद जी ने जल प्रोक्षण किया तो वह मृत देह.विलुप्त हो गया। फिर स्वामी जी ने समत दिशाओं में अभिमंत्रित जल का प्रोक्षण किया। कई आवाजें आने लगी। सभी मृत आत्माओं का उद्धार हो गया। तब आकाश का अंधकार छंट गया और प्रकाश फैल गयाः। वृक्ष पुष्पित और पल्लवित हो गये। भैरवघाटी का मंत्रजाल दूर हो गया। दूसरे दिन स्वामी चिद्घनानंद जी  माता गौरी के आज्ञानुसार पुरोहितों द्वारा विवाह.करवाया। उसके बाद शरद पूर्णिमा के दिन  अनिरुद्ध और प्रियंवदा के हाथों  गौरी माता के मंदिर में चंडीहोम करवाया।
    अब वह भैरवघाटी पवित्र हो गया और फिर वह पुरानी चालुक्य राजधानी  मान्यखेत अब गिरिजाक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ।
    पन्द्रह दिन बीत गये थे। अनिरुद्ध को शिवमोगा फॉरेस्ट रैंज में आज ज्वाइन करना था। अनिरूद्ध और प्रियंवदा ने  स्वामी चिद्घनानंद जी,और स्वामी स्वरूपानंद जी से आशीर्वाद लिया। विरजाक्षेत्र के पुजारी गिरिजाशंककर ने भी वर वधू को आशीर्वाद दिया। स्वामी चिद्घनानंद जी और स्वरूपानंद जी अदृश्य हो निज स्थान को चले गये। अनिरूद्ध  शिवमोगा में अपना कार्यभार संभाला। अब भैरवघाटी, यानी मान्यखेत यानी गिरिजाक्षेत्र अनिरुद्ध के शिवमोगा रेंज में ही आती है। अब वह "फॉरबिडन लैंड्स"नहीं रही।  शिव, माता गौरी और भैरवनाथ जी की कृपा से कलिंग राजकुमार अनंतवर्मन और चालुक्य राजकुमारी देवसेना अपने राज्य में राज करने लगे।
         (समाप्त)
(यह कहानी  ,स्थानों और पात्रों के नाम पूर्णतः काल्पनिक है और ऐतिहासिकता का दावा नहीं करता। किसी समता समात्र संयोग है।)
   (सर्वाधिकार सुरक्षित।)