तुम  हमारी चेतना हो सोच हो संवेदना हो
क्या करे कुछ दूर तुमसे सोचना आता मिलो नही 

ध्यान पर बैठेकभी  तो ध्यान मे भी शेष हो तुम 
शून्यता पाना असंभव भाव का आवेश हो तुम 

खो चुके  तुम्ही से हो सुरू वो बात है हम
शब्द मे मिलो हमेशा खोजते दिन रात है हम

तूम मिलो हंस केमिलोहमे अब लौटना आता नही है 
क्या करे कुछ दूर तुमसे सोचना आता नही है 

शांति का तुम रास्ता हो ब्यस्तता के जंगलो मे
और हलचल हो हृदय की शांति फुर्सत के पलो मे

नेह मलयानिल तुम्ही हो नेह की हो उष्णता भी 
रिक्तता भी हो तुम्ही तुम हो हमारी पूर्णता भी 

सामने तुम हो न हो पर दृश्य तुम ही हो पलो का
अब परे इसके हमे कुछ देखना आता नही है 

सांस का हर तार तुमसे तार का झंकार हो तुम 
छेडते है जो मधुर उस गीत का गुंजार हो तुम 

मुस्कुराहट हो हमारी अश्रुओ की पंक्ति भी हो 
मन द्रवित कर दो क्षणो मे पर हमारी शक्तिभी हो

डुबते हीजारहे यह प्रेम में भी जानकर हम
तृण बचा ले जो हमें वह थामना आता नहीं है..
क्या करें कुछ दूर तुमसे सोचना आता नहीं है।




उर्मिला तिवारी 
देवरिया