चलें लिखें कुछ निज बातें वर्तमान हालातों की।
कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे निज जज्बातों की।
ऐसा समय ख़राब चल रहा,कभी ना देखा ऐसा।
वर्तमान में जो आज हो रहा,कभी नहीं था ऐसा।
घर में भी नहीं सुरक्षित जानें,बाहर रहे कोई कैसे।
ऐसी बीमारी का प्रसार फैला,जिएं तो जिएं कैसे।
कोरोना संक्रमण मार रहा है,लोगों को कैसे कैसे।
ऑक्सीजन की कमी हुई है, मिले नहीं देकर पैसे।
अस्पताल में बेड नहीं है खाली,जीवन खतरे में है।
कई डॉक्टर जो हैं वह भी,कोविड पॉजिटिव में है।
ये कोरोना नया स्ट्रेन वैरिएंट,खतरनाक साबित है।
इंसानों के जीवन पर मौत,बन कर यह काबिज है।
इंसानों का दुश्मन बन बैठे,इस विपदा की घड़ी में।
ब्लैक मार्केटिंग करें बैठ,आफत के विषम घडी में।
पांच-2 गुना में बेंच रहे हैं,जीवन रक्षक सिलिंडर।
दस गुना दाम लेके देतेहै,इंजेक्शन रेमिडिसिविर।
एम्बुलेंस भी 10-20 हजार,लेकर मरीज पहुँचाये।
मुर्दो को भी लेजाने का 15-30 हजार में ले जाये।
लकड़ी भी मंहगी बेचें,तौलें भी तो वो कम कर के।
जलती हुई चिताओं की,लकड़ी बेच रहेंहैं बिन के।
कैसे कोई रहेगा सुरक्षित, कुछ भी समझ ना आये।
डर भय व्याप्त हुआ इतना,जाये तो कहाँ पे जाये।
सोशल डिस्टैंसिंग मात्र ये,सिर्फ एक है यही उपाय।
प्रभु के हाथ ही ज़िन्दगी,किसको वो कब ले जाय।
खुद से कोई भी लापरवाही,करना बड़ा है घातक।
अपना ध्यान रखें सब कोई,तब भी आती आफ़त।
2020 से कहीं ये ज्यादा,2021 का बुरा समय है।
किसी को मालुम नहीं है,किसका ये बुरा समय है।
कभी ताऊते तूफ़ान आया,कभी भूकंप के झटके।
इंसा की जान जा रही,कुछ जीवन मौत में अटके।
कहीं जहजेन डूब रही हैं,कहीं जल प्रवाह है भारी।
गंगा जी में लाशें बहतीं,देखो तो दुःख होता भारी।
ब्लैक फंगस नई बीमारी,ये ले रही चपेट में अपने।
आँखे भी जाती हैं इसमें,जां भी खतरे में है अपने।
कोरोना और इस बीमारी से,सब टूट गए हैं सपने।
कितना अस्पताल में भर्ती,कितनों ने खोये अपने।
ऐसे नीच दिखे हैं आपदा में,वे अवसर समझ बैठे।
भरें तिजोरी कालाबाजारी से,कईगुना दाम हैं ऐंठे।
मानव नहीं ये दानव हैं सब,गिद्ध बनके नोंच रहे हैं।
कितने पैसे कहाँ कमालें विपदा में,बैठे सोच रहे हैं।
शासन एवं प्रशासन में भी,सब दिल के साफ नहीं।
विपदा में भी कमीशन लेते,हर आपूर्ति साफ नहीं।
कहाँ जायेंगे ऐसे मानव,धरती के बने जो बोझ हैं।
धर्म कर्म ना सूझे इनको,सिर्फ पैसे की ही सोच है।
लगता है जैसे शायद अब,कलयुग जाने वाला हो।
इस लिए है त्राहि-2 मची,अधर्म का बोलबाला हो।
प्रकृति बनाती है संतुलन,हम सब ने ये बिगाड़ा है।
ऐसा दुःख देरही है हमको,उसका खेल बिगाड़ा है।
प्रभु से है प्रार्थना मेरी,सबकी रक्षा करना भगवान।
तुम्ही सुख दुःख देने वाले,परम पिता दया निधान।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

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