बोल लेखनी कुछ तो बोल
निर्भय हो अधर तू खोल ।
मत डर सत्ता के गलियारों से
मत डर कलंकित चौबारों से
जहां दिखे तनिक भी झोल
निर्भय होकर अधर तू खोल ।
जब वृद्ध आश्रम में बुढ़ापा हो
जब विधवाओं का तन नापा हो
तब ना चुप रह तू खामोशी तोड़
निर्भय होकर अधर तू खोल।
गर कलम की धार आगे ना आएगी
तब दिशा समाज को कौन दिखाएगी
तू बन आवाज दीन वर्ग की
अंधेरों का रास्ता तू मोड़।
निर्भय होकर अधर तू खोल।
बोल लेखनी कुछ तो बोल।
सीमा कौशल यमुनानगर हरियाणा

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