जब बहुरानी जी पहली बार हवेली आई तब उनकी नजरे आश्चर्य चकित होकर चारो तरफ हवेली को देख रही थी।
बाबा सा ने मुझे बुलाया और बहुरानी जी से मुझे मिलावाया और उनसे कहा कि उन्हें किसी भी चीज की जरुरत होगी तो ये दृश्या आपकी मदद करेगी।
मै बहुरानी को उनके कमरे मे लेकर जाती हूँ।
वह अपने कमरे को देखकर पूछती है।
दृश्या ये कमरा मेरा है क्या ?? कितना सुंदर और भव्य है।
मैने बहुरानी को कहा आप आराम करिए कल सुबह आपको मै पूरी हवेली घूमा दूँगी।
आज तो आपके जीवन की खास रात है। नींद बहुत जरुरी है। कुछ चाहिये होगा तो ये बेल बजा दिजिएगा मै हाजिर हो जाऊँगी।
मगर वह इतनी उत्साहित हो रखी थी कि वो सोने के बजाय बहुत खुश होकर अपने कमरे मे लगे बड़े बड़े झुमर तो कभी संगमरमर के नक्काशीदार दीवार को छूकर देख रही थी। कशीदाकारी मखमली बिछे हुए कालिन, जालीदार परदे, मीनाकारी फूलदान , एक से एक महँगे समानो को बड़ी बड़ी आँखे करके देखते हुए मुस्कुरा रही थी। देखते देखते वो अपनी कमरे की बालकनी मे पहुंँच जाती है। वहाँ सीढी देखकर वो एक उँगली गालो पर रखकर सोचते हुए नीचे उतरती जाती है। वहाँ हरे भरे गार्डन को देखकर हिरणी के जैसे बलखाती हुई मेक्सिकन घास पर अपने पैरो को रगड़कर देख रही थी। रँगबिरँगे फूलो की बनी पगडंडियाँ पे वो नंगे पाँव छमछम करती हुई घूमती है। दोनो हाथ फैलाकर गोल गोल घूमने लगती है। बिल्कुल छोटी बच्ची लग रही थी। उतनी ही मासूम और उतनी ही प्यारी।
मैं उनके पास जाकर पूछती हूँ। आपको नींद नहीं आई क्या?? बहुरानी मेरे कंधो पर दोनो हाथ रखकर मुझे भी अपने साथ गोल घुमाते हुए खिलखिलाती है।
"नहीं सखी"
"क्या कहा आपने मुझे सखी??"
"बड़े भोलेपन से बहुरानी कहती है मैने कुछ गलत कह दिया क्या ??"
"नहीं कुछ गलत नहीं कहा बड़े लोग छोटे लोगो को कहाँ इतनी इज्ज़त देते है।"
"मै छोटे लोग बड़े लोग नहीं जानती। मेरी भाभी माँ ने मुझे सबको एक ही नजर से देखना सिखाया है।"
अब चलिए गोधूलि बेला भी ढलने को है। भूख लगी होगी आपको। चलिए आपको तैयार करने के लिए ब्यूटीशियन आ गई है।
वो मेरा हाथ पकड़कर कहती है। हाँ चलो सखी
बहुरानी एक तो पहले से इतनी खूबसूरत थी। तैयार होने के बाद तो ऐसा लग रहा था ,जैसे पूरी कायनात की खूबसूरती इन पर बरस रही हो।
कमरे मे कैंडल की रोशनी से पूरा कमरा जगमगा रहा था। मोगरे और गुलाब के फूल से कमरा महक रहा था। बहुरानी की खुशी आँखो और चेहरे से झलक रही थी। गोल बिस्तर पारिजात के फूलो की लड़ी चारो तरफ से लटक रही थी।
बहुरानी घूँघट डालकर आदित्य सा का इंतजार करने लगती है। सुहागरात के दिन भी शराब के नशे मे चूर बहकते कदमो से आदित्य सा अपने कमरे मे दाखिल होते है।
चहकती चिड़िया ने अरमान सजाया।
अपने साजन के लिए अंग अंग महकाया।
नोंचकर नोंचकर पँखुड़ियो को रौंद दिया।
दीवानगी की सारी हदो को पार कर दिया।
सुबह नाश्ते की टेबल पर बाबा सा ने मुझसे बहुरानी के लिए पूछा।
जाओ उन्हे भी बुलाकर लाओ। फिर बोले, अच्छा आज रहने दो। वो अभी राजघराने के कायदे नहीं जानती है। कल से वो मुझे नाश्ते के टेबल.पर समय पर नजर आनी चाहिए ये देखना तुम्हारा काम है।
जी हुकुम !!!
मै बहुरानी के कमरे मे चाय लेकर जाती हुँ।
कमरे का दरवाजा खटखटाती हूँ तो देखती हूँ कि दरवाजा पहले से ही खुला हुआ था। मैंने अपनी नजरे कमरे मे चारो तरफ दौड़ाई देखा आदित्य सा कमरे मे नही थे। मगर पूरा कमरा बिखरा हुआ था। सारी फूलो की लड़ी तोड़कर कालीन पर बिखरी हुई थी। मेरी नजरे बहुरानी को ढूढने लगी। सिसकियों की आवाज जिधर से आ रही थी मै वहाँ चलती चली गई।
देखा वह गार्डन मे अपने सर को दोनो पाँवो को सटाकर उसके ऊपर रखकर सिसक सिसक कर रो रही थी।
मैंने उनको पुकारा. .उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। मै हौले से उनके करीब जाकर कंधे पर हाथ रखती हूँ। मेरे हाथ रखते ही वो भय से चौंककर मेरी ओर देखती है।
मुझे देखते ही लिपटकर फफक फफक कर रोने लगती है।जैसे कोई अपनी बड़ी बहन से बिछड़ने के बाद मिलती हो वैसे ही वो मुझसे लिपटकर रोने लगी।
मैंने उनके बाल को सहलाते हुए पूछा क्या हुआ??आप ऐसे यहाँ क्यों बैठी हो। आदित्य सा ने आपसे कुछ कहा क्या?? मेरे इतना कहते ही उसने अपने चेहरे और छाती पर से आँचल को हटाकर दिखाया। देखो सखी ,देखो , कोई अपनी पत्नी के साथ ऐसा व्यवहार करता है क्या??जानवर से भी बत्तर सूलूक किया है मेरे साथ कहकर चित्कार मार कर रोती है। जगह जगह काटे हुए निशान देखकर बरबस मेरी आँखो से आँसु ढुलक पड़ते है।
मैंने उन्हे कलेजे से लगाया। सर को सहलाते हुए चुप कराने की कोशिश करती हूँ।
जैसे ही उन्हें कमरे मे लेकर आने के लिए उठाती हूँ उनके पैर लड़खड़ाने लगते है। वह गिरने ही वाली थी वक्त पर मैंने उन्हे थाम लिया। सेवक को बोलकर गर्म दुध मे हल्दी डालकर मँगवाकर उनको पिलाती हूँ। उनके जख्म पे हल्दी का लेप लगाने लगी तो उनके मुँह से आह निकल आई। मै उनको आराम करने को कहकर जाने लगती हूँ । वह मेरा हाथ पकड़कर मुझे रोकते हुए कहती है, सखी मुझे छोड़कर मत जाओ मुझे डर लग रहा है। बहुत डर लग रहा है। मुझे मेरे भईया और भाभी माँ के पास जाना है। मुझे नहीं रहना
यहाँ । ऐसे कहते हुए दर्द से बेहोश हो जाती है।
अभी उम्र ही क्या है , बहुरानी की अठ्ठारह साल की ही तो है। इस उम्र मे लड़की अपने पलको पर अपने राजकुमार के कितने सपने सजाती है। पर इनके तो सभी सपने चकनाचूर हो गए थे। कल जो गिलहरी की तरह फूदकर रही थी। एक ही रात मे सारी चंचलता दुख और दर्द मे तब्दील हो गई। न जाने क्यो मुझे इनसे इतना लगाव महसूस हो रहा था। इनके कराहने से मुझे दर्द हो रहा था।
क्रमशः

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