"हौसले के तरकस में
कोशिश का वो तीर जिन्दा रखो,
हार जाओ चाहे जिन्दगी में सब कुछ
लेकिन फिर से जीतने की उम्मीद जिन्दा रखो."
हां, कुछ यही पंक्तियां मेरे जहन में उस वक़्त आयी जब भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए भारत को और खुद को पहला रजत पदक दिलाया और इसके साथ ही वह वेटलिफ्टिंग में रजत पदक लाने वाली पहली भारतीय एथलीट बनीl यह पदक चानू ने 49 किलोग्राम भार वर्ग में जीता है जिसके लिए उन्होंने इस प्रतियोगिता में 202 किलोग्राम वजन उठाकर चीन की होऊ जहुई के बाद अपना स्थान निश्चित कियाl
आज हम सभी जिस मीराबाई चानू की प्रशंसा करते नहीं थकते, उस मीरा की 2016 रियो ओलंपिक में बेहद खराब प्रदर्शन से टोक्यो ओलंपिक में मेडल लाने तक की कहानी न केवल जबरदस्त और धमाकेदार है बल्कि सभी के लिए प्रेरणादाई भी हैl
ओलंपिक में दूसरे खिलाड़ियों से पिछड़ना अलग बात है पर अपना खेल ही न पूरा कर पाना किसी भी खिलाड़ी का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है और यही हुआ था रियो ओलंपिक में मीराबाई के साथ, जब उनके नाम के साथ लिखा गया "डिड नॉट फिनिश" I
रोज जिस वजन को वह यूं ही उठा लिया करती थी उसी के लिए उस दिन उसके हाथ मानो बर्फ से जम गए l अपनी इस असफलता के बाद वह डिप्रेशन में चली गई और एक समय तो उन्होंने अपने खेल को मानो अलविदा कहने का भी मन बना लिया, पर कहीं न कहीं उनमें अभी भी हौसला बाकी थाl जिसकी बदौलत प्रतियोगिताओं में वह फिर वापस आयी l इस बार भरोत्तोलन में 48 किलोग्राम वर्ग में 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता और अब ओलंपिक में रजत पदक l
इस 4 फुट 11 इंच की लड़की की कहानी मैं चाहूंगी हर वह व्यक्ति पढ़े जो असफलताओं से घबराकर या तो अपना रास्ता बदल लेते हैं या फिर आगे बढ़ने का ईरादा।
8 अगस्त 1994 ई. को मणिपुर के एक छोटे से गांव में जन्मी मीराबाई के मन में जाने कैसे मणिपुर की महिला वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी के एथेंस ओलंपिक में जाने का दृश्य मानो बस सा गया और उसी दिन उसने वेटलिफ्टर बनने की ठान लीl उसकी इस जिद्द के आगे ना तो इम्फल से 200 किलोमीटर दूर बसा उसका सुबिधा विहीन गांव ही आड़े आया या और न ही लोहे के अभाव में बने बांस के बारl
रोजाना 50 से 60 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग सेंटर में जाकर अभ्यास करना सरल न था वो भी बिना उचित डाइट लिएl पर वह रुकी नहीं, बढ़ती ही रही l 11 साल में अंडर -15 चैंपियन तो 17 साल में जूनियर चैंपियन, यहां तक कि अपनी आईडल कुंजूरानी के 12 वर्ष पुराने रिकॉर्ड को मीरा ने 2016 में 192 किलोग्राम वजन उठाकर स्वयं ही तोड़ा l
पदक जीतने के बाद मीरा की आंखों से बहने वाले अश्रु उस दर्द के गवाह है जो वह 2016 रियो ओलंपिक के बाद से रोज झेल रही थी l उसमें सच ही तो कहा कि "वह मणिपुर की नहीं भारत की बेटी हैl"
"कैसे कह दूं कि थक गई हूं मैं
न जाने किस किस का हौसला हूं मैंl"
-निगम झा
स. उप- निरीक्षक
स. सी. बल
सिलीगुड़ी

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