प्रियंवदा के माता पिता काफी चिंतित रहने लगे। उसके अजीब से सपने और भैरवघाटी का वर्णन उनके लिये एक बड़ी समस्या बन चुकी थी। वे सोचने लगे कि यदि उस महान ज्योतिषी माधव शास्त्री की बात सच हों तो उनकी फूल जैसी कोमल बेटी ऐसे भयंकर जगहों में खतरनाक परिस्थितियों का सामना कैसे कर सकेगी?और यह सब उनकी ही बेटी क्यों करे!
उस दिन प्रियंवदा ने फिर एक.सपना देखा। सपने में माता गौरी कह रही थी- "प्रियंवदा, अब तुम्हारे महान कार्य करने का समय आ गया है। कलिंग देश में वैतरिणी नदी के तट पर विरजाक्षेत्र है, जहाँ मैं विरजा नाम से विराजमान हूँ । परसों अष्टमी तिथि से वहाँ मेरे मंदिर में शरद् नवरात्रि का उत्सव आरंभ होगा। पुत्री तुम विरजाक्षेत्र आओ, वहाँ तुम्हारे जीवन में एक महत्वपूर्ण घटना घटेगी। विजयी भव!" इतना कहकर माँ गौरी अंतर्धान हो गई। प्रियंवदा जगकर आंखें मलकर देख रही थी। सामने उसकी माँ खड़ी थी। उसने बेटी से पूछा -"क्या हुआ ,बेटी,तुम लगातार माँ ,माँ पुकारे जा रही थी!" प्रियंवदा ने सपने की सारी बात माँ को बताई।
प्रियंवदा की माँ मेनका देवी अब पूरी तरह आश्वस्त हो चुकी थी कि यह सब कुछ दैवी शक्ति द्वारा कुछ महान कार्य की भूमिका है। वह स्वयं माता गौरी की अनन्य भक्त थी । अतः उसका संदेह जाता रहा और उसी दिन वह भी अपनी पुत्री के साथ विरजाक्षेत्र जाने की ठान ली। उसने जब अपने पति से यह बात बताई । चंद्रभान ने अपने पुराने मित्र देवेन्द्र कुमार को फोन लगाया जो भुवनेश्वर में फॉरेस्ट कंजर्वेटर हैं । उन्होंने उसे सारी बात बताई और कहा कि उन्हें विरजाक्षेत्र में विरजा माता के दर्शन करने हैं। देवेन्द्र कुमार ने सारे प्रबंध कर दिये और चंद्रभान कश्यप उसी दिन सुबह के फ्लाइट से वे पत्नी और पुत्री के साथ भुवनेश्वर पहुंच गये।
दोपहर एक बजे देवेन्द्र कुमार उन्हें लेने स्वयं एयरपोर्ट पहुंचा और उन्हें अपने बंगले पर ले गया। बातचीत करते हुए चंद्रभान ने उससे पूछा कि भैरवघाटी नाम का कोई वन्यक्षेत्र कहीं है क्या। इस पर देवेन्द्र ने बताया कि ऐसा कोई वन्यक्षेत्र हमारे देश में है ही नहीं। चन्द्रभान की सारी बात सुनकर वह इतना जरूर कहा कि दक्षिण भारत के बीहड़ों में पश्चिमी किनारे पर "फॉरबिडन लैंड्स " नाम का एक क्षेत्र है, जिसके बारे में बाहरी दुनियां कुछ नहीं जानती । सरकार ने उस क्षेत्र को कंटीली तारों की एक तीस फुट ऊंची बेड़ा बांध दी और उस वर्जित क्षेत्र की ओर किसी को जाने की अनुमति नहीं है। वहां पुलिस का सख्त पहरा रहता है। वह इसलिए कि जो भी उस क्षेत्र के आसपास फटकता है, वह या तो गायब हो जाता है या उसका मृत शरीर बड़ी भयानक अवस्था में कहीं दूर पड़ा मिलता है। यह तार का बेड़ा कब किसने बंधवाया कुछ पता नहीं, पर सदियों से अंग्रेजों जमाने से यही परंपरा चली आ रही है। वह बड़ा ही तिलस्मी वातावरण है।चन्द्रभान चिंतित-से सब सुन रहे थे।
देवेंद्र कुमार ने अपने फॉरेस्ट जीप से उन्हें जाजपुर भेजा ,जहां वे सर्किट हाउस में ठहरे। सुबह होते ही वे तीनों वैतरिणी नदी में स्नान कर विरजा मंदिर पहुंचे। उनके साथ एक फॉरेस्ट गार्ड था। मंदिर परिसर में पहुंचकर वे एक असीम आनंद का अनुभव कर रहे थे।
चन्द्रभान के मंदिर में कदम रखते ही उन्हें एक सुखद आश्चर्य हुआ। उके सामने भानुप्रताप खड़े थे। वे अपने मित्र के गले लग गये और अपनी अपनी बात सुनाने लगे।। चन्द्रभान ने अपने बेटी के स्वप्न में माँ गौरी के दर्शन की बात बताई। वहीं भानुप्रताप अपने बेटे अनिरुद्ध को सपने में स्वामी स्वरूपानंद का दिखना और उनकी पत्नी को सपने में शिवजी का दर्शन होना तथा दोनों को ही विरजा क्षेत्र जाने की बात कहना सब कुछ बताया। फिर दोनों मित्रों को यह समझ में आ गया कि किसी महान कार्य के लिये माँ गौरी इन दोनों परिवारों को प्रेरित कर रही है।
फिर वे सब मिलकर मंदिर में माँ गौरी के दर्शन करने आगे बढ़े। जैसे ही वे ध्वजस्तम्भ तक पहुंचे कि सामने से विरजा मंदिर के प्रधान पुजारी गिरिजाशंकर मिश्र आये और सभी को ले जाकर विरजा माता के दर्शन कराये और शास्त्रोक्त विधि से पूजन करवाया। देवी के दर्शन से सभी के मन अति प्रसन्न थे।
इसके बाद वे सभी को मंदिर के प्रांगण में एक चबूतरे पर बैठाकर कुछ बातें बताने लगे।उन्होंने कहा कि उन्हें रात को स्वप्न में विरजा माता ने दर्शन दिया और निर्देश दिया कि आज सर्वप्रथम आने वाले दो परिवारों को माता के दर्शन कराऊँ तथा आज अष्टमी के दिन चंडीहोम कराऊँ । चंडीहोम कराने के बाद आपलोगों के साथ दक्षिण भारत में स्थित भैरवघाटी में शांतियज्ञ कराऊँ। मैंने जब पूछा कि यह भैरवघाटी कहाँ है और कौन मुझे मार्गदर्शन करेगा, तब माता ने कहा कि एक महात्मा स्वामी स्वरूपानंद तुम्हें मार्गदर्शन करेंगे। आपको इस विषय में क्या जानकारी है?तब अनिरूद्ध ने स्वामी स्वरूपानंद का उनको दर्शन देना तथा ऋषिकेश में सद्गुरु चिद्घनानंद का दर्शन देना आदि सब बताया। पुजारी गिरिजाशंकर के कहे अनुसार भानुप्रताप ने दीक्षावस्त्र पहनकर चंडीहोम संपन्न किया। पूर्णाहुति दी जा रही थी कि तभी स्वामी स्वरूपानंद मंदहास करते हुए उनके बीच प्रकट हो गये। अनिरुद्ध उन्हें देखते ही उनके चरणों में गिर पड़ा। सभी ने खड़े होकर स्वामी को प्रणाम किया।
पूर्णाहुति के साथ चंडीहोम के संपन्न होने पर स्वामी स्वरूपानंद ने सभी को बैठाकर आनेवाले पूर्णिमा के दिन होनेवाले महायज्ञ के बारे में समझाने लगे।
स्वामी स्वरूपानंद ने कहा -" भक्तजनों, यह हम सभी का सौभाग्य है कि हमारी इष्टदेवी विरजा माता हमें इस महान कार्य हेतु उपयुक्त समझकर हम सभी को इस तरह इकट्ठा किया है। यह बहुत बड़ा और कठिन कार्य है। इसमें समय समय पर हर स्थान पर माता की इच्छा और प्रेरणा से और व्यक्ति भी जुड़ेंगे। हम सभी को अपना निर्धारित कार्य करते हुए इस महायज्ञ को संपन्न करन होगा। दक्षिण के बीहड़ जंगलों में भैरवघाटी नाम का एक अदृश्य और अगोचर एक महा अरण्य क्षेत्र है । वहाँ कभी एक संपन्न राज्य था और चालुक्य वंश के राजा वहाँ राज्य करते थे। पर एक दुष्ट सेनापति के कारण वह राज्य नष्ट हो गया और उस सेनापति ने एक दुष्ट तांत्रिक की सहायता से उस राजधानी नगरी को नागबंधन में बंधित कर दिया और युद्ध में मृत उस नगरी के लोगों की आत्माओं को कैद कर रखा है। हमें वहाँ महामृत्युंजय होम और शांतियज्ञ करना होगा और भैरवघाटी को शापमुक्त करना होगा। इस कार्य में कुमार अनिरूद्घ और कुमारी प्रियंवदा को आगे रहना होगा। यही विरजा माता की आज्ञा है । हमें कोई भय नहीं, माता हर कदम पर हमारे साथ रहेगी।"
उन्होंने आगे कहा -"कल सूर्योदय होते ही हमें दक्षिण की ओर निकलना होगा। सर्वप्रथम अनिरुद्घ गाड़ी चलाते रहेगा और उसके साथ मैं अदृश्य रूप में बैठा रहूँगा । मैं अनिरुद्ध को मार्ग दिखाऊंगा।पीछे तुम लोगों की गाड़ियां रहेंगी। .पुजारी गिरिजाशंकर अपने साथ पाँच अन्य पुजारियों को लेकर हमारे साथ चलेंगे। हम सभी की यात्रा की व्यवस्था विरजाक्षेत्र के वन्य अधिकारी कर चुके हैं।अतः कल सुबह छह बजे सभी अपने अतिथि गृह से प्रस्थान करें।" इतना कहकर स्वामीजी अदृश्य हो गये।
पुजारी गिरिजाशंकर ने उनको स्वप्न में यह सब जानकारी देने की बात कही और कहा कि वे कल सुबह छह बजे मंदिर प्रांगण से प्रस्थान करेंगे। भानुप्रताप, चंद्रकांत कश्यप और उनके परिवार पुजारी जी को प्रणाम कर अपने सर्किट हाउस को चले आये।
(शेष अगले भाग में)

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