हर बार तुम्हारी यादें, हर बार तुम्हारी आंखे! 
हम उनमें ही खो जाये, हर बार तुम्हारी बातें!! 

वो रातो की तन्हाई, न नीदों की भरपाई! 
जो मर्म छिपा इस दिल मे, उस मर्म को न कह पायी!! 


न वक्त है न वो साथी, न दीप की वो फिर बाती, ! 
अब उर मे दर्द समाया है, अब तो फैली तन्हाई है!! 

उन लम्हो का पागलपन था, जिनमें बसता भोलापन था! 
एक चादर ओढी सपनो की, बूदें भर आयी है!! 

सावन आने मे देरी है, कुछ बाते अभी अधूरी है! 
बस एक बार बतला जाओ, क्यू खामोशी अब छायी है!! 
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर लेखिका
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत