सुजाता आज बहुत खुश है उसका मन मयूर बनके आज नृत्य करने को आतुर है। और उस पर ये बारिश की बूंदें तो जैसे सोने पर सुहागा ।
खुश क्यों नहीं होगी सुजाता आखिर इतने बड़े घर से उसका रिश्ता जो जुड़ा है। इतने रईस घर में रिश्ता होना तो सुजाता के लिए किसी सपने से कम नहीं है।
हरी प्रसाद जी एक सीधे साधे साधारण इंसान हैं । जो कि एक छोटे से गांव में रहते हैं ।उनकी आमदनी का जरिया उनकी एक किराने की दुकान और थोड़ी बहुत खेती है । सुजाता उन्हीं की सबसे बड़ी बेटी है। सुजाता से छोटे चार भाई बहन और भी है । जिनमें दो बहनें और दो भाई है।
सुजाता का रिश्ता जमुना लाल जी के बेटे मनीष से साथ तय हुआ है। जमुना लाल जी को पैसों की तो कोई कमी नहीं। अच्छा खासा बिजनेस है उनका । उन्हें तो एक सुंदर ,शुशील और जो उनके घर को संभाल सके ऐसी बहू चाहिए। पहले ही वह बड़े बेटे के लिए नौकरी वाली बहू और अपने जैसे पैसे वाले परिवार से रिश्ता जोड़कर देख चुके हैं।
बड़ा बेटा और बहू दोनों के नौकरी करने के कारण उनके पास इतना समय ही नहीं है कि अपने माता पिता के पास कुछ दिन आकर समय बिता सके। इसलिए जमुना लाल जी ने ये निर्णय किया कि, वह अपने छोटे बेटे मनीष की शादी एक साधारण परिवार से करेंगे। मनीष स्वभाव से काफी सीधा साधा लड़का है। उसके लिए तो अपने पिता का निर्णय ही सर्वोपरि है । मनीष की पढ़ाई पूरी हो चुकी है । परन्तु जमुना लाल जी नहीं चाहते कि छोटा बेटा भी उन्हे छोड़कर कहीं दूर जाए। इसलिए वे चाहते हैं कि मनीष उनके पास रहकर कोई बिसनेस करे। बड़े बेटे के बच्चों को तो वे खिला नहीं पाए कम से कम छोटे बेट के बच्चों के साथ तो अपना बुढ़ापा जी सकें। यही सोच कर उन्होंने अपने बेटे का रिश्ता हरी प्रसाद जी की बेटी सुजाता के साथ करने का निश्चय किया।
सुजाता सिर्फ सुंदर ही नहीं घर के प्रत्येक कार्य में भी बहुत निपुण है । घर में सबसे बड़ी होने के कारण घर के कार्यों का भार उस पर शुरू से ही अधिक रहा । क्यों कि उसकी की मां की तबीयत भी कुछ ठीक नहीं रहती । जिस कारण दसवीं के बाद उसकी पढ़ाई लिखाई भी नहीं हो सकी। ये भी सत्य है कि पांच बच्चों को इतनी महगाई में पढ़ाना एक साधारण इंसान के लिए आसान भी नहीं होता।
देखा जाए तो लड़कियों की पढ़ाई और नोकरी के प्रतिशत में कुछ समय से बढ़ोत्तरी तो हुई है, लेकिन ज्यादातर शहरों में । गांव में तो हालात आज भी कुछ ठीक नहीं है। सुजाता का संबद्ध भी एक छोटे से गांव से ही है जहां लड़कियों की शिक्षा से ज्यादा उनके घर के कार्य और विवाह पर अधिक जोर दिया जाता है। लड़कियों की शिक्षा में कमी का एक बड़ा कारण है लड़कों की चाहत में आमंदनी कम होने पर भी अधिक बच्चे पैदा करना।
सुजाता का रिश्ता एक बड़े घर में होने से घर में खुशी का एक अलग ही माहौल है। सुजाता की मां तो जैसे फूली ही नहीं समा रही है। आखिर खुशी की तो बात ही है । बड़े लोगों से रिश्ता जुड़ना किसको नहीं भाता। दौलत का नशा तो वो नशा है जो कि किसी भी इंसान की बुराइयों को भी अनदेखा कर दे।
इन्द्रदेव जी ने भी आज खूब बरस कर सुजाता की खुशियों में चार चांद लगा दिए। सुजाता सोच रही है कि अभी कुछ दिन में ही उसकी शादी हो जायेगी तो क्यों ना बारिश का पूरा लुफ्त उठाया जाए । पता नहीं फिर ससुराल में कभी इस तरह बारिश में नहाने का मौका मिलेगा या नहीं। इसलिए आज तो सुजाता जी भर के बारिश में भीगना चाहती है । जब इंसान अंदर से खुश होता है तो छोटी छोटी खुशियों को भी जी भर के जीना चाहता है। लेकिन जब कोई भी इंसान मन से खुश नहीं हो पाता तो उस वक्त बड़ी खुशियां भी उतनी मयानें नहीं रखती। सुजाता की आंखों में तो अपनें आने वाले भविष्य के लिए मनीष के साथ कितने सुनहरे सपने हैं उसका खुश होना तो जायज ही है। विवाह प्रत्येक लड़की और लड़के के लिए एक नए जीवन की शुरुआत भी होती है। हर कोई अपनें जीवन को बेहतर और खुशनुमा बनाने के लिए न जाने कितने सपने सजोंता है।
कुछ ऐसे ही सपनों में खोए हुये सुजाता और मनीष का विवाह का दिन भी आ गया। अपनी सामर्थ्य के अनुसार हरी प्रसाद जी ने विवाह की अच्छी तैयारियां की है।
लगता है कि मनीष और उसकी छोटी बहन श्रुति में कुछ ज्यादा ही स्नेह है। क्योंकि विवाह के सारे दिन उसकी बहन श्रुति ने मनीष का साथ एक मिनट के लिए भी नहीं छोड़ा ।कई बार तो वह मनीष को कुछ रस्मों के विषय में ऐसे समझा रही है जैसे वह कोई बच्चा हो। मनीष से कोई मजाक भी ना करे इसके लिए भी उसने सभी से साफ माना किया है। किसी भी बात का उत्तर मनीष से पूछने पर भी अधिकतर वहीं दे रही है क्योकि मनीष थोड़ा शर्मीले स्वभाव का है। सुजाता की मां पुष्पा जी तो सीधे स्वभाव का दामाद पाकर खूब प्रसन्न हैं।
सारी रस्मों को निभाते हुए आखिर विदाई की घड़ी भी आ गई। लगता है कि खुद इंद्रदेव भी हल्की हल्की बूंदों के माध्यम से सुजाता को आशीर्वाद देने आए हैं। और बारिश की बूंदे भी बरस कर विदाई की रस्म को निभाना चाहती हैं । माता पिता को भले ही अपनी बेटी के लिए अच्छा घर परिवार मिलने की लाख खुशी हो, परन्तु विदाई के समय वो भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाते । एक बेटी के लिए भी विदाई की घड़ी बड़ी मुश्किल घड़ी होती है। जिस घर में जन्म लिया अपना बचपन बिताया वही घर एक दिन पराया हो जाता है। और जिस घर को अभी तक जाना भी नहीं वही अपना घर हो जाता है। एक तरफ एक नया कल होता है तो दूसरी तरफ अपनों से दूर जानें का दुख।
लेकिन जब बेटी को ससुराल में खुशी मिलती है तो माता पिता संतुष्ट रहते हैं और बेटी भी अपनी खुशियों और अपने माता पिता को संतुष्ट देख कर अपने जीवन में खुशी खुशी आगे बढ़ जाती है। परन्तु जरूरी तो नहीं कि प्रत्येक बेटी को ये खुशियां मिल सके। कहते हैं कि दुख के बाद सुख और सुख के बाद दुख आता है । क्या ये हमेशा सत्य होता है?
क्रमश: अगले भाग में.........
कविता गौतम✍️

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