सुनहरे दिन लड़कपन के दिन,
जब याद आती है मुझे जी
चाहता है कुछ पल लूँ छिन
कितने मस्ती भरे थे वो दिन....।
बेफिक्र सी रहती थी बस गुड्डे गुड़ियों,
की फिक्र रहती थी छोटी छोटी बातों पे
खुशियों से भर जाती थी.......।
पर वक़्त ने लिया ऐसा मोड़,
आगे बढ़े यादों को छोड़
गर होता एक जादुई डोर
बांध लेती यादों को चारों ओर
जब फुरसत मिलती किसी दिन
फिर ले आती सुनहरे दिन
लड़कपन के दिन...…….।
ऋचा कर्ण✍✍

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