जीवन है हर रोज इक नई प्रयोगशाला
दिखाई देता है हर रोज इसमें
एक दिखावे का प्रयोग निराला
ये जीवन बन गया है वास्तव में
मात्रा एक दिखावे की प्रयोगशाला
जिसने प्रत्येक इंसान का रूप ही बदल डाला
न जाने ये विज्ञान ने कैसा प्रयोग कर डाला
हम बन चुके हैं आदि विलासिताओं के
भावनाओं को भी हमने बनावटी बना डाला
कर कर के प्रयोग मशीनों का
स्वास्थय को अपने खराब कर डाला
मेहनत से चुरा कर जी
खुद को आलसी बना डाला
जरूरी हैं ये प्रयोग भी समय को देखते हुए
मगर प्रत्येक प्रयोग का करो उपयोग सीमा में रहते हुए
वरना वो दिन भी दूर नहीं
जब इंसान भी एक मशीन होगा
भावनाओं से परे तो हो चुका है आज भी
आने वाले कल में वो सिर्फ एक
जीती जागती मशीन होगा
जिसमें दिमाग तो खूब होगा
मगर न जीने का कोई सलीका होगा
बची हुई है जो थोड़ी सी मिठास रिश्तों में
उसकी जगह सिर्फ दूरियों का कड़वापन होगा
भाएगा न कोई किसी को कभी
रिश्तों का न कोई नाम ओ निशा होगा
अब तो मतलब से ही सही पूछ लेते हैं लोग
कल किसी को किसी से कोई मतलब भी नहीं होगा
तो सोचो इस जीवन रूपी प्रयोगशाला में
कैसा रसायन नया तैयार होगा
जो भर जाएगा प्रत्येक के मन में प्रत्येक के लिए
तो फिर कल कैसा हा हा कार होगा
जब इस जीवन रूपी प्रयोगशाला में
विज्ञान के हाथों से
एक इंसान जैसा रोबोट तैयार होगा।।
कविता गौतम✍️

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