हाँ! कहने को तो लौट गए थे गोरे,
हमको हमारा स्वराज लौटा कर
लेकिन चालें अनेक चल गए-
काले अंग्रेज गद्दी पर बिठा कर
खींच कर लहू की लकीर-
हंसते थे हम पर हमारा टुकडों में देश बांट कर!!
ज़ख्म हमेशा का दे गए-
हमारी मां का आंचल काट कर!!
लाखों घात-प्रतिघात हुए,
लाखो भीतर-घात हुए-
खंजर कुछ सीने, कुछ पीठ में धंसे,
अपनों में से अपनों को छांटते
गद्दारों की भीड से लड़ते,
हर दर्द पर हर बार मगर,
आंसू पोंछ कर हम फिर हंसे!
कहीं धर्म और जाति, के नाम पर लडे
कहीं बटते रहे बताने बडा अपना समुदाय!
हर भेद भुला कर फिर मगर,
झुकने नहीं देते कभी
थाम लेते हैं ध्वज वो शान से
जिसमें लिपट वीर घर लौट कर आए!
अनेक रंगों से सराबोर देश हमारा
अनेक भाव हैं अनेक आशाएं
हर भाव में माटी का प्रेम छिपाए--
75 स्वतंत्र सावन हुए हैं
एक ही स्वर्णिम स्वप्न सजाए
एक भारत- श्रेष्ठ भारत
बनाने की आस मन में छिपाए--
फिर एक हो जाते हैं हाथों में
देशभक्ति के एक रंग में रंगा
तिरंगा फिर हाथों में उठाए!
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