करीब ही थी मंजिल जरासी 
चंद सांसे कुछ दगा कर गयी ।

उस पार तलक थी साथ जरासी 
जिने की वजह  दगा कर गयी ।

निगाह मे समाये असमान को
वो सपने  जब दगा  कर गयी ।

बता किस दौर से गुजर रही वो
उस पनाह से छाव दगा कर गयी ।

बारिशों के मौसम मे तडपती जो
पलकोंतले बसीं आह दगा कर गयी ।

ओस की नन्हीं बूंद बनकर आयी जो 
वो बरसात की आँधी दगा कर गयी ।

बेगुनाह अल्फ़ाज सता रहे यूही 
वो हर अरमान से दगा कर गयी ।

वो भीगी रात अर्दास कह रही 
जिंदगी से उम्र कुछ खफा हो गयी ।

तोहम्मते  लाख लगायी गयी जो
जिंदगी के इरादे कुछ  दगा कर गयी ।

✍@Sari 
©️®️सारिका ऐवले।