क्या सुनाएं दास्तां उस शोख से दिल लगाने की
खुद ही तीर चलाने की, खुद ही चोट खाने की
अब जो बेसाख्ता आ ही गए हो इस दिल में तो
जरूरत ही क्या है किसी और को आजमाने की
मैं तो अपने आप में हूं एक मुकम्मिल मुहब्बत
बेकार ही ख़ाक छानते हो आप यूं जमाने की
नजरों का कसूर बन गया देखो ताउम्र का गिला
ना बात अब हकीकत की रही ना अफसाने की
ये निगाहें ही बयां कर देती हैं तेरा पूरा वज़ूद
जरूरत ही क्या है तुम्हें रूख से पर्दा हटाने की
अपनी बेबसी पर परेशान भी हैरान भी है ' लाल '
किसी सूरत में नहीं रिहाई अब इस कैदखाने की
🌹🌹रंजन लाल 🌹🌹🙏🙏

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