यलगार था वो
देश के जुनूनी नौजवानों का
मातृशक्ति ने दिया था वरदान
देशभक्ति का
थी एक बानगी जीवन की
विप्लव था देश का
आजादी की चाह थी मन में
ज्वाला धधक रही थी मन में
एक नए सवेरे की चाह में
सत्याग्रह को हथियार बना
एकजुट हुए देश के सेनानी
डगर थी मुश्किल
आसां नहीं था स्वप्न साकार कर लेना
रात को भी दिन बना
मर मिटने का भाव लिए
बदलाव की चाह लिए
विवेक को अपनी ढ़ाल बना
उच्चादर्शो के पदचिन्हों पर चलकर
बढ़ चले सेनानी
रक्त से अपनी
भारतमाता के पैरों को पखार
बिखरे हुए को एक कर
दिया आजादी का उपहार
आजादी का ये पर्व मना रहा हिन्दुस्तान
जय हिंद 🙏 🙏
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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