राजकुमार सुबाहु भले ही अभी आयु में बहुत बड़े नहीं थे पर एक राजकुमार की सोच हमेशा बड़ी ही होती है। अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझते थे। उसके लिये प्रयास भी करते। पर जब भी वह किसी आयुध से अभ्यास करते, पता नहीं क्यों उनके बाजुओं में दर्द होने लगता। धनुष से लक्ष्य भेद करते समय अनायास ही उनके नैत्र बंद हो जाते। नैत्रों के सामने अंधकार छाने लगता। शरीर में अजीब सी कमजोरी सी महसूस होती जो राजकुमार को उनके निश्चय से डिगा देती।
वैसे राजकुमार शरीर से कमजोर न थे। पूरे गुरुकुल में उन जैसा बलिष्ठ कोई दूसरा न था। हर खेल कूद की प्रतियोगिता में वह अब्बल रहते। भारी से भारी बजन को उठा लेते। पर अस्त्रों के अभ्यास के समय उनकी अदृश्य कमजोरी को कोई भी स्वीकार नहीं कर पाता। भला किसे पता था कि यह राजकुमार का दोष नहीं है। यह उन क्षणों का परिणाम है जिसमें राजकुमार पैदा हुए थे। दूसरों की भूल राजकुमार की लापरवाही मानी जाती। राजकुमार को राजधर्म के उपदेश दिये जाते। जिनसे सबसे ज्यादा कष्ट उसी राजकुमार को होता।
एक राजा को हमेशा अपनी प्रजा की रक्षा करनी होती है। फिर रणभूमि में राजा को हमेशा प्राण अर्पण करने के लिये तैयार रहना होता है। राजकुमार सुबाहु सौराष्ट्र देश के भविष्य के राजा हैं। इस तरह की लापरवाही से वह किस तरह रणभूमि में अपने देश की रक्षा कर सकेंगें।इससे तो अच्छा था कि देश को राजकुमार होता ही नहीं। हालांकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि राजा का पुत्र ही देश का शाशक बने। शाशक वही बन सकता है जो देश की विपत्तियों में देश का नैत्रत्व कर सके। जो हर रणभूमि में आगे बढकर देश वासियों को दिखला सके कि तुम्हारा राजा हमेशा तुम्हारी विपत्ति में साथ है। देश की रक्षा के लिये प्राणों की आहुति भी दे सकता है।
गुरुओं से नित्य ही इस तरह के उलाहने सुनता वह बालक हर रोज अपना प्रयास करता पर जल्द ही थक जाता। मन ही मन वह भी निश्चित कर चुका था कि शायद वह देश के शासक के रूप में अयोग्य है। वह किसी भी रणभूमि में आगे बढकर अपने देश की रक्षा नहीं कर सकता है। शायद देश को किसी अन्य शासक की आवश्यकता है।
फिर भी वह राजा का पुत्र तो है। वह अपने कर्तव्य से भाग भी नहीं सकता है। उसे अपना प्रयास जारी रखना होगा।
उस दिन भी राजकुमार सुबाहु तलवार को चलाने का प्रयास कर रहा था। उसे पता ही नहीं था कि महाराज सत्यव्रत उसके प्रयासों को देख रहे हैं। अपनी एक पुरानी भूल पर पश्चाताप कर रहे हैं। महाराज का मन हो रहा था कि आकर पुत्र को गले लगा कर कह दें कि बेटे। यह तुम्हारी कमी नहीं है। यह मेरा ही दोष है। पर खुद की भूल स्वीकार करना आसान भी तो नहीं है। उसमें देश के राजा के लिये तो कदापि नहीं। राजा के मुख से निकला हर वाक्य इससे प्रेरित होता है कि इसका देश की प्रजा पर क्या असर होगा। राजा को लगातर उद्यम करते रहना चाहिये। राजा द्वारा अपनी भूलों को जाहिर कर देने का बहुत दूरगामी परिणाम होता है। प्रजा के मध्य अराजकता की स्थिति आ जाती है।
आज भी राजा ने राजकुमार पर उसकी लापरवाही पर क्रोध किया। उसे अनेकों तरीकों से उलाहना दिया।
" अरे मूर्ख। क्या तुझे इतना भी समझ नहीं आता कि तुम सौराष्ट्र का राजकुमार हो। तुम ही सौराष्ट्र की उम्मीद हो । राजकुमार को सभी विद्याओं में दक्ष होना चाहिये। पर राजकुमार की मुख्य विद्या तो शस्त्र विद्या ही है। इसके ज्ञान के बिना भला कैसे एक राजा अपनी प्रजा की रक्षा कर सकता है। तुम्हें अंतिम बार समझाने आया हूं। जल्द से जल्द सिद्ध करो कि तुम सौराष्ट्र के युवराज बनने के योग्य हों। अन्यथा सौराष्ट्र में वीर बालकों की कमी तो नहीं है। सौराष्ट्र ही नहीं अपितु पूरा विश्व देख लेगा जब एक राजा अपने राजधर्म का पालन करते समय अपने पुत्र की भी चिंता नहीं करेगा। "
जब कोई भी मनुष्य खुद की कमी को किसी अन्य पर रखता है तो निश्चित ही आत्मग्लानि की अग्नि में तो दहलने लगता ही है। अग्नि से दग्ध मनुष्य शीतलता की तलाश में भागता है। वही दशा महाराज सत्यव्रत की हो रही है। उनकी जीवन की हर समस्या का एक ही जगह समाधान था। एक ही था जिससे महाराज अपने मन की बातों को कह सकते थे। महारानी चित्रसेना से मिलने के लिये महाराज तेजी से राजमहल की तरफ भागे जा रहे थे। केवल महारानी ही थीं जो आज भी महाराज को अवलंबन देती थीं। आज भी महारानी मानतीं थीं कि राजकुमार सौराष्ट्र के भावी शासक बनने के पूर्ण योग्य हैं। बहुत समय पूर्व की गयी एक नादानी का परिणाम देवों की जिस नाराजगी के रूप में झेलना पड़ रहा है, एक न एक दिन उसका हल निकलेगा। सौराष्ट्र में फिर से खुशहाली आयेगी।
जिस व्यक्ति के प्राण निकल रहे हों, अमृत की कुछ बूंदें ही उस व्यक्ति के प्राणों की रक्षा कर देती हैं। आशा का छोटा सा दीपक भी निराशा के अंधकार को नष्ट कर देता है। जिस प्राकृतिक आपदा का सामना धनी से धनी राष्ट्र नहीं कर सकता, सौराष्ट्र पिछले पंद्रह वर्षों से उस आपदा से गुजर रहा है। फिर भी आज तक अपने वर्चस्व और सम्मान को बचाये हुए है, उसका मुख्य श्रेय महारानी चित्रसेना की आशावादी सोच को ही जाता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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