भावनाओं के सागर में डूबते को जैसे ही कोई बाहर निकालने बाला मिलता है तब डूबने बाला बचाने बाले को ही इस तरह पकड़ लेता है कि अनेकों बार डूबने बाला बचाने बाले भी डुबोने लगता है। पर कुशल तैराक वही है जो खुद डूबे नहीं अपितु डूबते को बाहर निकाल लाये।

   पुरुष और स्त्री की आदतों का वर्गीकरण करने पर एक सामान्य धारणा यही बनती है कि महिलाएं ज्यादा भावुक होती हैं। पुरुष भावनाओं पर बेहतर नियंत्रण कर लेते हैं। पर यह बात शायद पूर्ण सत्य नहीं है। वास्तव में पुरुष भावनाओं को नियंत्रण में करने का ढोंग करते हैं जबकि स्त्रियां वह ढोंग करना नहीं जानती हैं। मन में भरे शोक को आसानी से आंसुओं के माध्यम से बहा देती हैं। पर पुरुष अपने सीने में इतना दुख दबाता रहता है कि यदि वह इकट्ठा बहने लगे तो निश्चित ही भावनाओं की बाढ आ जाये।

  आज सचमुच बाढ आ गयी ।अभी तक बार बार महाराज को भावनाओं के सागर में डूबने से बचाती आयीं महारानी खुद उसी समुद्र में डूबने लगीं। 

  दोनों उस दिन को याद करने लगे जब वे दोनों मुनि कर्दभ को मनाने निकले थे। विवाह को अनेकों वर्ष बीत चुके थे। फिर भी महाराज निःसंतान थे। अपनी तरफ से सारे प्रयास किये। वैद्यों से इलाज के साथ साथ पंडितों द्वारा उपासना के कार्य भी। पर संतान की प्राप्ति तो तब होती जबकि ऐसा उनके भाग्य में हो। इस विषय में महाराज अभागे थे। यह बात महाराज की कुंडली बोल रही थी। सारे सुख होने पर भी निःसंतानता का जो दुख होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मुनि कर्दभ की ख्याति सुनी थी। महाराज और महारानी ने मुनि की महीनों सेवा की। तब जाकर मुनि प्रसन्न हुए। 

  पर बात कुछ और विकराल थी। विधि द्वारा प्रदत्त भाग्य में बदलाव कुछ तो संकट लाता ही है। एक सुख की प्राप्ति कुछ तो दुख देगी ही। मुनि ने स्पष्ट रूप से दो बातें बता दीं। 

  पहला कि उत्पन्न पुत्र प्रयास करके भी क्षत्रियों की कला में पारंगत नहीं हो पायेगा जब तक कि खुद सभी देव उससे प्रसन्न न हो जायें। राजा का पुत्र अस्त्र विद्या में अज्ञानी रह जायेगा। 

  दूसरी बात और भी कठिन। पुत्र से संबंध रखने बाले सभी किसी आपदा से परेशान रहेंगें। 

  एक तरफ कूआ था तो दूसरी तरफ खाई। एक तरफ निःसंतानता थी तो दूसरी तरफ अनोखी शर्तें। कुछ पाना है तो कुछ खोना होगा। 

  उस दिन महाराज और महारानी के विचार अलग थे। महाराज के अनुसार यदि पुत्र अस्त्र विद्या नहीं भी जानेगा तो भी वह उनका जीवन संवार ही देगा। उनके बाद पितरों का श्राद्ध और तर्पण तो करेगा। संसार में जी तो लेगा ही। फिर माता पिता तो पुत्र के लिये कष्ट सहन करते ही हैं। हम भी कुछ आपदा सहन कर लेंगें। 

  पर रानी का विचार कुछ ज्यादा ही विस्तृत था। एक राजकुमार का संबंध पूरी प्रजा से होता है। फिर इस तरह पुत्र प्राप्ति का दंड प्रजा भुगतेगी। यह तो ठीक नहीं है। 

  राजा के अनुसार ऐसा नहीं है। यह उनका व्यक्तिगत मामला है। उनके पुत्र के होने से मिलने बाला सुख और दुख केवल उन्हीं का होगा।

  अंत में महाराज की बात मानी गयी। मुनि कर्दभ ने उन शर्तों के अनुसार महाराज सत्यव्रत के सारे गृह बदल दिये। निपूते के भाग्य में पुत्र लिख दिया। 

  वह भादौं के महीने की रात थी। इसी महीने की एक रात को भगवान श्री कृष्ण धरा पर आये थे। हर रोज बारिश होती थी। राजकुमार सुबाहु ने जन्म लिया। पर आपदा बाली बात में रानी का मत सही निकला। राजकुमार के जन्म के बाद से ही बादल सौराष्ट्र का मार्ग भूल गये। पंद्रह वर्षों में सौराष्ट्र में एक भी बूंद बारिश नहीं हुई। धरती का जल स्तर गिरता जा रहा था। सौराष्ट्र जो खाद्यान्न का बड़ा निर्यातक था, अब अन्न का आयातक था। अच्छी बात यह थी कि राज्य में दूसरे अनेकों उद्योग धंधे थे। जिनके बलबूते अकाल की इतनी बड़ी आपदा को सौराष्ट्र वासी झेल पा रहे थे। 

  महाराज और महारानी के लगातार प्रयासों से ही अभी तक स्थिति संभल रही थी। पर अब दोनों ही जानते थे कि आगे स्थिति सम्हल नहीं पायेगी। अब आपत धर्म मानते हुए उन्हें वह अचूक उपाय अपनाना होगा जो वे लगातार अनेकों वर्षों से टालते आ रहे थे। 

  " तो अब क्या करना चाहिये। महारानी।" 
"महाराज। अब तो आपत धर्म का ही पालन करना होगा। जब देश के सम्मान के लिये युद्ध किया जाता है तब भी तो प्रजा से अनेकों मृत्यु को प्राप्त होते हैं। किसी का पुत्र, किसी का पति तो किसी का पिता संसार से विदा होता ही है। देश की रक्षा के लिये प्रजा में से कुछ के प्राणों का बलिदान हमेशा होता रहा है। आखिर यह भी तो एक रणभूमि है। प्रजा में से कोई तो खुशी खुशी देश के लिये अपने प्राणों की आहुति देने आयेगा ही। "

" तो फिर ठीक है महारानी। मैं कल ही प्रजा के मध्य मुनादी करबा देता हूं। नैष्ठिक ब्राह्मणों को बुलबाता हूं। हमारे सौराष्ट्र की रक्षा केवल और केवल इसी यज्ञ से संभव है। इस यज्ञ के बाद देवों सहित देवराज इंद्र भी सौराष्ट्र की अवहेलना नहीं कर सकते। फिर से सौराष्ट्र में बारिश होगी। प्रजा खुशियों के गीत गायेगी। "

  केवल किसी यज्ञ के करने से इतनी बड़ी आपदा टल जाती है तो राजा को तुरंत ही वह यज्ञ कर लेना चाहिये। पर यथार्थ कुछ ज्यादा ही पीड़ादायक है। शायद कुछ तो ऐसी बात है कि अनेकों वर्षों से इस यज्ञ को टाला जा रहा है। शायद इस यज्ञ में कोई तो ऐसी बात होगी कि वेदों में अचूक फलदायी के रूप में वर्णित होने पर भी अकाल की स्थिति में महाराज जनक ने भी यह यज्ञ नहीं कराया था। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'