कबीर वंशज कहां डरे हैं भूपों की हुंकारों में।
कलम कहां टिक पाती सत्ता के गलियारों में।।
कलम विरोधी रही हमेशा सत्ता के दीवानों की।
कवियों ने कब परवाह की अपने आशियाने की।।
जब जब कलम चली सत्ता संग जनमानस रोया।
उसी समय कवियों ने भी अपना वजूद खोया।।
कवियों को कैसे बांधोंगे के लालच के किरदारों में।
कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।।
जब सत्ता मतवाली होती कलम राही दिखलाती।
बड़ा विनाश तभी होता जब कलम मौन हो जाती।।
कवि मन होता बंजारा जिसके पैर कहीं न टिकते।
उन विलासी महलों में कवियों के मन ना रुकते।।
कवियों को कैसे जकड़ोगे डर रूपी हथियारों में।
कलम कहां टिक पाती है सत्ता के गलियारों में।।
नाम - विक्रांत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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