पंख होते हुए भी पंछियों की
 आकाश में उड़ने की हद होती है,
ये औरत है साहिब!! इसके तो
सपनों की भी हद होती है।
बचपन से सुनती आयी हूँ 
की लड़कियों को सपने देखने का अधिकार नही होता है।
वो वही देखती है जो समाज उन्हें
दिखाना चाहता है।
तो अपने मासूमियत भरे मन में
खुद ही खुद से सवाल किया करती थी,
कि क्या स्त्रियों में भी कोई 
क्वालिटी हुआ  करती थी।
अगर हा!!
तो झांसी की रानी,अहिल्या,अपाला,
कौन सी क्वालिटी में आती है,
जो हर मुसीबत को पार कर
अपने सपने पूरे करती है।
समय के साथ मैं भी बड़ी हो गयी,
और जमाने की सच्चाई से रूबरू हो गयी।
घर को स्वर्ग बनाने वाली स्त्री लक्ष्मी होती है,
लेकिन उसी लक्ष्मी को 
कभी लक्ष्मीपूजन का अधिकार क्यों नही मिलता है।
स्त्रियों के बंद आंखों के सपने हो 
या खुली आँखों के ख्वाब हो,
समाज उन्हें अपनी आकांक्षाओं तले दबाता है।
मत दो बिखरने सपने बेटियों के
इन्हें भी चाँद तारों तक पहुंचने दो,
मजबूत बना दो इनके हौसलों की चादर 
और अटल विश्वास से जीने दो।
बंद अथवा जागती हुई आंखों
 में सतरंगी सपने सजने दो,
तूफानों से लड़कर इन्हें पी.वी.सिंधु,
और मीरा बाई चानू बनने दो।।

@शीला द्विवेदी "अक्षरा"