मम्मा !! मम्मा !! आयशा नींद मे ही चिल्लाती है..रेनु जी अचानक से हड़बड़ा कर भागती हुई ,आयशा को बोलती है "क्या हुआ बेटा ,"
"मम्मा बहुत दर्द हो रहा है, हास्पिटल के बेड मे कराहती हुई "आयशा बोलती है।
आयशा - "रोते रोते बोलती है मैने किसी का क्या बिगाड़ा था , जो भगवान ने मुझे इतनी बड़ी सजा दी।
आखिर मेरे साथ ही भगवान ने ऐसा क्यों किया??
मम्मा मुझे बहुत असहनीय दर्द हो रहा है , मेरे पैर हिल
भी नही रहे है ,क्या हुआ मेरे पैरो मे मम्मा..मम्मा बोलो न मम्मा"
रेनू जी - "कुछ नहीं हुआ मेरा बच्चा ,चुप ह़ो जाओ , ईश्वर को स्मरण करो , आँख बँद करके सोने की कोशिश करो।"
आयशा "मम्मा मेरे हाथ मे भी बहुत पीड़ा हो रही है"
रेनु जी - "सिलाईन लगी हुई है न.इसलिए पीड़ा हो रही
है बेटा , थोड़े देर मे ठीक हो जाएगा बच्चा ,आयशा का सर सहलाते हुए बोलती है।"
तब तक नर्स आकर आयशा को नींद की ईंजैक्शन
दे देती है।
आयशा को इंजेक्शन लगते ही थोड़ी देर में नींद आ जाती है। लेकिन बेहोशी मे भी आयशा बुदबुदाती रहती है .."बहुत दर्द हो रहा है मम्मा"...."मुझे बहुत दर्द हो ....रहा...है"
आयशा जाँब करना चाहती थी।
आयशा की मम्मी की सहेली का माँल मे गिफ्ट शाँप
था , माध्वी आंँटी (आयशा की मम्मी की सहेली) ने आयशा को आँफर किया ।
उनके साथ शाँप चलने के लिए ,क्योंकि माध्वी जी निजी कारणों की वजह से असमर्थ थी अपना सत् प्रतिशत अपने बिजनेस को देने मे। चाहती थी आयशा उसे संभाल ले।
आयशा ने झट से आँफर स्वीकार कर लिया। उसकी
मन की मुराद जो पूरी हो रही थी।
आयशा क़ो एक महीना लग गया अपने काम को समझने मे , अब बिना किसी की मदद के कस्टमर को डील करना सिख गई थी। कस्टमर के पसंँद के मुताबिक , वह खुद खरीदकर दुकान मे माल लाने लगी थी।
आयशा बहुत मृदु भाषी थी। स्वभाव से बहुत मिलनसार थी। अब माँल के अगल बगल वालो दुकानदारो.से भी अच्छी जानपहचान हो गई थी।
माँल ग्यारह बजे खुलती थी ,उस दिन घर मे श्राद्ध होने की वजह से अपनी मम्मी के साथ पंडितों को खिलाने पिलाने मे आयशा क़ो काफी लेट हो गया था। उसने अपने पापा को बाईक से छोड़कर आने को कहा।
आयशा अपने पापा के साथ बाईक मे माँल जाने के लिए निकल जाती है, रास्ते मे बाईक के सामने गाय आ जाती है ।उस गाय को बचाने के चक्कर मे बाईक असंतुलित हो जाती है , आयशा बाईक से नीचे गिर जाती है। उसे काफी दर्द हो रहा था चाहकर भी उठ नहीं पर रही थी। लोगो की भीड़ जमा हो गई सड़क मे , कुछ लोगो की मदद से किशोर जी (आयशा के पापा ) उसे हास्पिटल ले जाते है ।
हास्पिटल मे एडमिट करके घर पर फोन करके रेनु जी को पता बताते है, और तुरंत हास्पिटल आने को कहते है। घबराई हुई रेनु जी भागकर किशोर जी के पास हास्पिटल पहुंचँ जाती है।
जो हुआ किशोर जी अपनी पत्नी रेनू को बताते है , फिर बताते बताते रोने.लग जाते है।
किशोर जी डाक्टर के चैम्बर मे खड़े रहते है ,डाक्टर आयशा का चेकअप करके उनको बताते है कि आयशा की जाँघ की हड्डी टूट गई है आपरेशन करना पड़ेगा।
किशोर जी और रेनू जी आर्थिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी। मगर..जैसे तैसे रकम जुगाड़ करके हास्पिटल मे पैमेंट करते है। आयशा का आपरेशन कर के डाक्टर उसके पैर मे एक रोड लगा देते है।
दो दिन तक दवाओं के असर से वो बेहोश रहती है।
किशोर जी खुद को दोष देने लगते है की उनकी वजह से उनकी बेटी को चोट लगी है। ना तो आयशा मेरे साथ जाती ना ही उसे चोट लगती । आत्मग्लानि से भरकर वो आयशा से एकबार भी मिलने नहीं जाते।
आयशा अपनी मम्मी से हमेशा पूछती थी सभी मिलने आते है पापा क्यों नही आते है??
वह हमेशा कहती पापा की ड्यूटी की टाईम बढ गया है इसलिये नहीं आ पाते लेकिन हर दिन तेरे लिए पूछते है।
पंँद्रह दिनो तक आयशा हास्पिटल मे रहती है ..
छोटी बच्ची की तरह रेनू जी आयशा के शरीर को तौलिए से भींगाकर पोंछती ,उसके मल मूत्र साफ करती , आयशा जी बहुत धीरज और सहनशीलता के साथ दिन रात बेटी की सेवा करती , भागदौड़ करके घर से खाना बनाकर हास्पिटल लाती , अपने हाथो से खाना खिलाती ,बैठे - बैठे सकरात्मक बाते करती ,कभी उसे भजन सुनाती। कभी उसे लोरी सुनाकर , हाथो से थपकाकर सुलाती।
पंँद्रह दिनो के बाद आयशा को हास्पिटल से छुट्टी मिल जाती है.। डाक्टर बीच बीच मे आकर चेकअप करवाने की सलाह देते है।
रेनू जी हास्पिटल के स्टाफ की मदद से आयशा को व्हील चेयर मे बैठाकर आँटो मे बैठाकर घर ले आती है।
घर पहुँचते ही आयशा की नजरे अपने पापा को ढूँढती है..अपने पापा को देखे हुए आयशा को पंँद्रह दिन हो जाते है। लेकिन वो खुद इतनी बेबस थी की वह चलकर उनके पास भी नहीं जा सकती थी।
आयशा वही कमरे मे बैठे बैठे ,पापा....पापा कहकर
पुकारती है। रेनू जी सुन तो रही थी आयशा की आवाज लेकिन वह चाहती थी की बाप बेटी के बीच मिलाप हो जाए। क्योंकि किशोर जी जब से आयशा को चोट लगी थी खुद न खाते पीते ना चैन से सोते थे खुद को ही कोसते थे उस मनहूस वक्त के लिए।
आयशा की आवाज सुनकर किशोर जी दौडकर आयशा के पास जाते है और पूछते है "क्या हुआ बच्चा ",और आजू बाजू उसके देखने लग जाते है।" कही कुछ गिर तो नहीं गया यह सोचकर।
आयशा रोते हुए कहती है "लगी है पापा बहुत जोर से चोट लगी है " किशोर जी पूछते है "कहाँ बेटा, कहाँ लगी है"
आयशा "मेरे दिल मे पापा" ,.पापा आप इतने निष्ठुर कब से हो गए एकबार भी मुझसे मिलने नहीं आए ।आपने कैसे सोच लिया आपकी वजह से मुझे चोट लगी है पापा ", "नहीं पापा नहीं"
मम्मा कहती है" ये नियती का दोष है पापा ,होनी माता ने अपनी चलाई....हल्के से गिरने से ही मुझे इतनी अंदरूनी चोट आ गई।" इसमे आप का क्या दोष , मेरे भाग्य मे यही लिखा था।
किशोर जी "मुझे माफ कर दे बेटा , सब मेरी वजह से हुआ , ना मै तुझे लेकर जाता ना ये हादसा होता।
"नही पापा इसमे आप की कोई गलती नही है ,जो होना होता है वो होकर रहता है "आयशा अपने पापा से कहती है।
किशोर जी कहते है" मेरा बच्चा इतना होशियार हो गया कहकर उनका गला रूंधने लगता है ,अपने पापा को समझा रही है।" इतना कहकर वह भी रो पड़ते है।
दोनो बाप बेटी खूब गले लगकर रोते है। दरवाजे पर खड़ी आयशा की मम्मी भी फफक कर रो पड़ती है।
और मन मे सोचती है मेरी हँसती खेलती ,सबकी मदद करने वाली मेरी बच्ची को न जाने किसकी नजर लग गई।
आँसू पौंछकर रेनू जी खाना बनाती है। और फिर आयशा को अपने हाथो से खाना खिलाती है। दवाई खिलाकर बत्ती बंँदकर करके उसे सुला देती है।
रेनू जी ने महसूस किया आयशा अपनी मम्मी पापा के सामने मुस्कुराती है। जब वो काम मे व्यस्त रहती है, आयशा अकेली रहती है तब वह चुपचाप शून्य होकर कमरे की सीलिंग को ताकती रहती है। आँखो के कोरे से आँसू बहते रहते है।
रेनू जी ने अपने आस पास के मोहल्ले के छोटे बच्चों की माँओ को बोलकर आयशा के पास पढाने के लिए भेजने को कहती है।
छोटे छोटे बच्चों को पढाने से उनकी चुलबुली बाते सुनकर थोड़ा हँसने बोलने लग जाती है। बच्चों को पढाने से आयशा का मन भी बहल जाता है और समय भी गुजर जाता था।
एक दिन रेनू जी आयशा से कहती है" बेटा मै चाहती हूँ
की तुम अपनी पढाई फिर से शुरु करो।"
आयशा "लेकिन कैसे होगा मम्मा"
आयशा की मम्मी "क्यों नही होगा??"
"मै चाहती हूँ तुम M.A ( अंग्रेजी) ऑनलाइन पढ़ाई कर लो , आराम से हो जाएगा। अगर कोई भी परेशानी होगी तो मैं हूंँ ना।"
आयशा मान जाती है।
रेनू जी किशोर जी से कहकर बुक्स मँगवा कर देती है।
इस तरह आयशा का समय बच्चो को पढाने मे ,और.अपनी पढाई करने मे वक्त बीतने लगा।
शाम के समय आयशा की मम्मी आयशा को व्हीलचेयर में बैठाकर के गार्डन में घुमा कर ले आया करती थी। जिससे उसका मन खुली वातावरण में प्रफुल्लित हो जाता था।
प्रतिदिन रेनू जी समय पर दवाई देना ,जूस ,फल- फूल हरी सब्जीयाँ आयशा को खिलाया करती थी।हल्के हल्के.हाथो से आयशा के पैरो और कमर मे मालिश कर दिया करती थी। आयशा मना भी करती थी , कहती थी मुझे आपकी सेवा करनी चाहिए थी। कैसा नसीब है मेरा ,मै अपनी माँ से ही सेवा करवा रही हूँ।
रेनू जी कहती आयशा से "जब तू ठीक हो जाएगी तब तू भी मेरी सेवा कर देना। सोए -सोए और लेटे-लेटे तेरी कमर और पैर अकड़ जाते होंगे इसलिए करती हूँ।"
आयशा "आप कितनी अच्छी हो माँ, सारा दिन मेरे लिए करते करते आप थक जाती होंगी फिर भी आपके चेहरे पर शिकंज नहीं आती है।"
"किस मिट्टी से बनी हो आप माँ"
रेनू जी हँसते हुए "जिस मिट्टी से तुम बनी हो।"
आयशा "आई लव यू मम्मा"
रेनू जी "लव यू टू मेरा बहादुर बच्चा"
सात महीने बाद डाक्टर ने आयशा को बैशाखी लेकर आहिस्ता आहिस्ता चलने का निर्देश देते है।
सात महीने से फिजिकल ऐक्टीविटी नहीं होने की वजह से आयशा के शरीर का वजन भी बढ़ गया था।
जब पहली बार उसकी मम्मी पापा ने उसे पकड़ कर खड़े करते है तो वो बहुत डर जाती है।
"नहीं मम्मा मै नही चल सकती हूँ"
उसे अपने पैरो को जमीन मे रखने मे डर लग रहा था।
डर से वह कँपकँपाने लगती है।
किशोर जी आयशा से कहते हैं "कोशिश करो, बहुत दिन बाद चल रही हो तो एक बार शुरुआत मे डर लगता है। लेकिन बेटा "डर के आगे ही जीत है।"
आयशा की मम्मी उसे धीरे धीरे बैशाखी से लेकर चलना सीखाने लगी ,शुरुआत मे वह डगमगा जाती थी
और हिम्मत हार जाती थी ..
आयशा "नही मम्मा मुझसे नहीं होगा मै कभी चलने नहीं सकूंँगी , हमेशा आप पर बोझ बनकर रहूंँगी लगता है , कहकर जोर जोर से रोने लग जाती।"
आयशा को आयशा की मम्मी समझाती है की" जब तुम बचपन में पहली बार चलना सीखी थी , ऐसे ही डगमगा कर चलती थी। कभी गिरती पड़ती तो कभी चोट लगा लेती ,फिर धीरे-धीरे दौड़ने भागने चलने लगी।
बचपन मे नहीं हारी तो अब कैसे हार सकती हो??"
रेनू जी फिर उसे समझाने के उद्देश्य से कहती है "आयशा क्या तुमने कभी छोटे जीव जन्तुओं को गौर से देखा है, चींटी को ही देख लो एक चीनी का दाना को जब तक अपने बच्चों तक नही ले जाती तब तक वह हार नही मानती जितनी बार उसके मुँह से गिर जाता है वह उतनी बार उठाती है। आखिर मै उसकी मेहनत रँग लाती है , वह कामयाब हो ही जाती है।"
"बेटा मेहनत करने वालो की कभी हार नहीं होती।उसे खुद से ही लड़ना पड़ता है। तब जाकर वह जीत का स्वाद चख पाता है।"
आयशा "मम्मा आपके जोश भरे शब्दों को सुनकर मुझ मे हिम्मत आ जाती है ,मै आत्म निर्भर बनुँगी।
आपकी बेटी हूँ आपकी जैसी ही हौसला वाली बनूँगी।"
आयशा अब जहाँ तक हो कोशिश करती अपने नित्य कामो को भी अपने से करने की ,बैठे ही बैठे अपनी मम्मी के काम मे उनका हाथ बँटा दिया करती।
अब वह आत्म निर्भर होने लगी थी।
फिर वह दिन भी आ गया जब आयशा खुद दिवार के सहारे पकड़कर बैशाखी को छोड़कर अपने पैरो से पहले की तरह तो नहीं लेकिन थोड़ा लचक कर चलने लगी।
आयशा स्वस्थ होकर एक साल बाद अपनी मम्मी के साथ माँल अपने शाप मे फिर से जाती है।
आस पास के सभी माँल मे बने दोस्त आयशा का फूलो का गुलदस्ता देकर स्वागत करते है , और उसकी हिम्मत की सराहना करते है।
आयशा अपनी मम्मी के गले लगकर सभी से कहती आज "अगर मे यहाँ अपने पैरो पर खड़ी हूँ तो ये मेरी मम्मा की हिम्मत , मेहनत और साहस के वजह से है।थैंक्यू मम्मा , मेरी मम्मा बनने के लिए ..हर जन्म मे आप ही मेरी मम्मा बनना।
(समाप्त)
शिल्पा मोदी✍️✍️

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