थींम : *दहेज़*






हमारी बेटियाँ सब से बड़ा खुद ही दहेज़ हैं।
ईश्वर की अमानत हैं जो माँ-बाप को हैं मिली।।

ये जरुरी नहीं बेटियाँ हर माँ-बाप को मिलें।
क़िस्मत वालों को मिलती हैं बेटियाँ जो मिलीं।।

यूँ तो होती हैं ये पराये घर की एक अमानत।
पीहर में पलती हैं ये अपने माँ-बाप की बेटियाँ।

घर सजाती हैं माँ-बाप की ये परी सी बेटियाँ।
बड़ी होके सजाती हैं सपने पिया की ये बेटियाँ।।

बेटी के हाथ पीले करने की जब घड़ी आती है।
अपनी है पर पराई अमानत से लगती हैं बेटियाँ।।

पिता कन्या दान करे यथा सामर्थ्य उपहार देके।
इसी अभिलाषा में सुखी हो बेटी ससुराल जाके।।

लोग कहते है पीहर से बेटी की डोली उठती है।
घर परिवार अच्छा मिले तो जीवन सुखी होता है।।

कुछ लोभी भेड़िये भी कभी ऐसा मिल जाते हैं।
किसी के चेहरे पे तो यह लोभ लिखा ना होता है।।

शादी बाद वह दहेज़ के लिए परेशां करें बेटियाँ।
कष्ट सहतीं मगर मुँह से कुछ न कहती हैं बेटियाँ।।

अत्याचार और दहेज़ की मार सहतीं हैं बेटियाँ।
जीवन नर्क बना देता है दहेज़ एक लालच होता।।

दहेज़ समाज का सबसे बड़ा अभिशाप है होता।
इसका शिकार होती हैं होती रही हैं यही बेटियाँ।।

इस दहेज़ के कारण अक्सर अर्थी भी हैं उठती।
दहेज़ लोभी भेड़ियों की शिकार होती हैं बेटियाँ।।

इसे बंद होना चाहिए लोभी को कड़ी सजा मिले।
पति को ही नहीं परिवार वालों को ये सजा मिले।।

बेटी की जान लेते हैं दहेज़ के लोभी दहेज़ वास्ते।
क़सूरवार को भी तो इसमें फाँसी की सजा मिले।।

मेरा तो यही कहना है दहेज़ देना ही अब बंद हो।
बेटी ही तो ये दहेज़ है इस सोच की जो पसंद हो।।

उस घर ही करें बेटियों का ख़ुशी से अब ये ब्याह।
जीवन में जिससे कष्ट न पाए इस बुराई दहेज़ से।। 

अभिशाप है यह सबसे बड़ा अभिशाप है दहेज़।
सामाजिक बुराई और सब से बड़ा पाप है दहेज़।।
 

रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव