राजा वृद्ध हो चुके थे,सात रानियों के होते भी वो निःसंतान ही थे।राजगद्दी यूं ही खाली रहेगी उनके बाद ,या दुश्मन राजा उनके राज्य को हथिया लेंगे,यही चिंता खाई जा रही थी।
ईश्वर में अटूट आस्था थी राजा की।एक रात स्वप्न में उन्होंने देखा कि कोई उनसे कह रहा था , कि दक्षिण दिशा में कलिंग राज्य की सीमा के पास एक सरोवर के पास एक अनाथ कन्या है,जो सदा शिवभक्ति में लीन रहती है ,अगर तुम उससे विवाह करोगे, तो तुम्हे अवश्य एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। राजा जब नींद से जागा तो उसने अपना स्वप्न अपने महामंत्री को बताया ।सलाह लेकर वो अकेला ही चल पड़ा।
शाम ढल चुकी थी ,वह कलिंग राज्य की सीमा में पहुंच चुका था,संध्या वंदन के लिए एक कन्या आरती की तैयारी कर रही थी।
राजा ने स्वप्न वाली कन्या को पहचान लिया।
उसने पथिक होने कि बात कह रात को आसरा देने का कन्या से निवेदन किया।कन्या ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
राजा ने कन्या का नाम पूछा उसने कहा रूपल ,खाना खाते समय राजा ने अपना परिचय दिया ,और उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।रूपल मना ना कर सकी ।और अगले दिन राजा अकेले नहीं रूपल के साथ राजधानी वापस लौटे।
धूमधाम से राजा का विवाह हुआ,रानी रूपल गर्भवती हुई।राजा रानी का बहुत ध्यान रखते थे ,यह बात अन्य रानियों को फूटी आंख न सुहाती।नियत समय पर रानी ने एक सुंदर राजकुमार को जन्म दिया।लेकिन कुटिल रानियों ने राजा को ख़बर भिजवाई की रानी ने सिल पत्थर को जन्म दिया है।बालक को छुपा कर बैलों के बीच छोड़ दिया ,लेकिन बालक का बाल भी बांका नहीं हुआ,उसे जहर पिलाया फिर भी कोई असर न हुआ।अंत में उनलोगो ने एक बक्से में बंद कर पानी में डाल दिया।
बक्सा तैरता नदी के किनारे जा लगा , जहां एक धोबी को मिला वह अपने घर ले आया,धोबिन बालक को देख कर प्रसन्न हुई ,दोनों निसंतान थे,वे नन्हे बालक का पालन पोषण करने लगे।
बालक का नाम रखा राघवेन्द्र ,प्यार से रघु कहते थे ।एक दिन रघु अपने पिता से जिद करने लगा उसे घोड़ा चाहिए।धोबी ने समझाया क्या करेगा घोड़ा ,लेकिन बालक जिद में अड़ गया।अंत में धोबी ने उसे लकड़ी का घोड़ा बनवा कर दिया।
बालक रघु घोड़े के साथ खूब खेलता ,और उसकी सवारी करता।पिता यह देख कर खूब प्रसन्न होते।कुछ समय के बाद बालक उस उस घोड़े को नदी किनारे ले जाता और उसे पानी पिलाने का प्रयास करता ।उस नदी में स्नान करने दुष्ट रानियां भी आती थी।वो उसपर हंसती ।एक दिन वो जोर जोर से हंसकर कहने लगी ,कहीं लकड़ी का घोड़ा पानी पीता है क्या?बालक ने कहा हां पीता है।मेरा घोड़ा पीता है,इस बात पर वो चिढ़ गईं,और बात राजा तक पहुंची।
बालक रघु को दरबार में राजा के सामने पेश किया गया।
राजा ने कहा - "क्यों तुम्हारा लकड़ी का घोड़ा पानी कैसे पी सकता है।"
बालक ने जवाब दिया -" एक स्त्री जब सिल - बट्टे को जन्म दे सकती है तो मेरा घोड़ा पानी कैसे नहीं पी सकता।"
राजा ने कहा -" तुम कहना क्या चाहते हो बालक ,विस्तार से बताओ।"
बालक ने अपने जन्म की पूरी कथा बताई ,अपनी सौतेली माताओं की सारी करतूत बताई।
राजा ने कहा - "तुम्हारे पास क्या प्रमाण है,जिससे साबित हो कि तुम मेरे पुत्र हो।"
बालक रघु ने अपनी मां रूपल को बुलाने को कहा ,पुत्र को देखते ही मां रूपल की आंचल से दूध रिसने लगा।और धोबी ने भी गवाही दी ये मेरा पुत्र नहीं मैंने इसे संदूक से निकाला था।
राजा ने रानी रूपल और पुत्र रघु को गले से लगा लिया।
अन्य रानियों को मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई।
परन्तु बालक रघु ने पिता से कहा कि उन्हें माफ कर दिया जाए।
पिता की मृत्यु के बाद राजकुमार राघवेन्द्र राजा बना ,उसके राज्य में कोई भी पीड़ित व्यक्ति ,किसी भी वक्त न्याय की गुहार लगा सकता था ।उसने बड़ी -बड़ी घंटियां लगा रखी थी ,कि फरियादी कहीं से भी घंटी बजा कर अपनी व्यथा राजा को सुना सकता था।
ऐसे न्यायप्रिय राजा के राज्य में प्रजा सुखी और सिंहासन सुरक्षित था।

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