बड़ी प्यारी, बड़ी सयानी, जग से न्यारी मेरी गुड़िया रानी।
बचपन सा नहीं है वो कमरा जिसमे रहती मेरी गुड़िया रानी,
ना खेल खिलौने, न बाजे गाजे न होती कोई लड़ाई,
बस एक कमरा जिसमे रहती मेरी गुड़िया रानी।
मन को प्रफुल्लित कर जाती उसकी वो हँसी नादानी,
वो खुद ही खुद से बातें करती, खुद ही मन को बहलाती,
कभी हसती, कभी हसाती नए-नए रूप बनाती जहां भी जाती नए रंग बिखेर जाती,
उसका वो चंचल मन कभी मोरनी बनके बड़े बड़ो को नाच नचाता,
कभी तो चुप गुमसुम सी हो जाती मेरी गुड़िया रानी।
है परियों सी प्यारी, वो पर फिर भी घबरा जाती है,
जब कोई डरावना स्वप्न उसको दिखता, किसी से भी न वो कह पाती है,
है नन्ही सी नटखट सी पर बड़ी सयानी मेरी गुड़िया रानी।
प्रिया धामा

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