भीम ने कहा मैं चाहता हूं वह मेरे जैसा वीर बने असहायों की मदद करें दुष्टों का दलन करे। दूसरों की रक्षा के लिए अगर अपने प्राण भी दे दे तो कोई बात नहीं।
हिडिंबा हिडिंबा गर्व से भीम को देख रही थी और सहसा उसके वक्त से लिपट गई, आप जैसा चाहते हैं तो वैसा ही होगा ।
भीम ने रूक कर कहा_
तुम उसे श्रेष्ठ योद्धा बनाना किसी अच्छे गुरु के निर्देशन में।
धीरे धीरे हिडिंबा के अल्हड़ प्रेम ने भीम के अंदर हिडिंबा के प्रति आसक्ति को जन्म दिया एक दिन भीम ने कुंती से कहा माते हिडिंबा गर्भवती है।
कुंती ने हंसकर कहा मुझे तो कोई लक्षण नहीं दिख रहा है और तू बता रहा है तुझे कहां से पता चला
माता अंबर ने मुझे खुद बताया भीम ने उत्तर दिया
बात सही थी धीरे धीरे जो हिडिंबा दौड़ दौड़ कर सब की सेवा कर लेती थी अब वह खुद ही काम करने में लाचार हो गई थी कुंती उसकी सेवा करती तो वह कातर नेत्रों से देखती और कुछ कहना पाती।
नियत समय पर हिडिंबा ने भीम के पुत्र को जन्म दिया, घड़े के समान चिकना,सिर पर एक भी केश न होने कारण भीम ने नामकरण किया घटोत्कच।
घटोत्कच कहते हैं, पैदा होते ही एक दम से बड़ा हो गया।
घटोत्कच के जन्म के बाद ,वादे के अनुसार ,सभी आश्रम छोड़ आगे के सफर में निकलने की तैयारी करने लगे।
हिडिंबा और भीम की जुदाई की बेला आ गई,हिडिंबा ने भीम से कहा _आर्य मैं आपका जीवन भर इंतजार करूंगी।
भीम की आंखों में आसूं आ गए। उनलोगो को छोड़ कर जाना ,उसके लिए असह्य था।
भारी मन से हिडिंबा ,घटोत्कच को कुन्ती के पास ले आई , कुन्ती ने आशीर्वाद दिया ।
हिडिंबा ने कहा ,जब भी हमारी आवश्यकता होगी ,मेरा पुत्र तुरंत सेवा में हाजिर होगा।
वक्त किसका हुआ है,वह तो आगे ही बढ़ता है,जीवन की यही सच्चाई है ,बीच बीच में जब भी पांडव अज्ञातवास पर आए ,उनकी सहायता घटोत्कच और हिडिंबा ने की।
जब अधर्म और अन्याय चरम पर पहुंच गया,पांडवों द्वारा युद्ध टालने के लिए संधि प्रस्ताव लेकर गए ,वासुदेव का अपमान कौरवों द्वारा किया गया,। तब पांडवों के लिए युद्ध अनिवार्य हो गया था।
कौरव सेना और पांडव सेना कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने सामने आ गए।
महाभारत युद्ध शुरू होने का आरंभ सुन हिडिंबा के पौत्र ,घटोत्कच और नागकन्या अहिलावती का पुत्र, बर्बरीक की इच्छा भी युद्ध में शामिल होने की हुई।
बर्बरीक महाप्रतापी, और महावीर था ,उसने माता चंद्रिका की तपस्या कर तीन अमोघ वाण प्राप्त किए थे, जो उसे त्रिलोक विजयी बनाने में समर्थ थे।
वह किसी भी युद्ध को मिनटों में जीतने का सामर्थ्य रखता था।
उसने माता से युद्ध में शामिल होने की आज्ञा ली ,माता ने जाते समय ये वचन लिया कि वह हारे हुए पक्ष का साथ देगा।
बर्बरीक को कुरुक्षेत्र के मैदान की तरफ आता देख ,वासुदेव की चिंता की लकीरें बढ़ गईं।
उन्हे पता था कि अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ा ,तो पांडवों की हार सुनिश्चित है।
वासुदेव ने ब्राह्मण का रूप लेकर बर्बरीक की काबिलियत का मजाक उड़ाया है,और छल से उससे अपना सिर दान के लिए तैयार किया ,बर्बरीक दान के लिए सहर्ष तैयार तो हो गया ,लेकिन उसकी एक शर्त थी कि वह पूरा महाभारत युद्ध देखना चाहता है।श्रीकृष्ण ने कहा ,_ऐसा ही होगा।
उस दिन फाल्गुन माह की द्वादशी थी,श्रीकृष्ण ने उसके सिर को वहीं रणक्षेत्र के निकट पहाड़ी पर सुशोभित कराया।
वहीं से बर्बरीक ने पूरा महाभारत युद्ध देखा।
कृष्ण ने उसके बलिदान से प्रसन्न हो उसे वरदान दिया कि तुम कलयुग के श्याम के रूप में जाने जाओगे ,क्योंकि हारे हुए का साथ देने की क्षमता सिर्फ श्याम में है।
राजस्थान के सीकर में खाटू श्याम जी का मंदिर है,यहीं पर बर्बरीक का सिर दफनाया गया था,जो कालांतर में दैव प्रेरणा से राजा के द्वारा वहां की खुदाई कर निकलवा कर मंदिर स्थापित कराया गया।
क्रमशः

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