बरसात भी नहीं पर बादल गरज रहे हैं,सुलझी हुई हैं ज़ुल्फ़ें और हम उलझ रहे हैं!!

मदमस्त एक भंवरा क्या चाहता कली से ,तुम भी समझ रहे हो हम भी समझ रहे हैं!!

अब भी हसीन सपने आंखों में पल रहे हैं,पलकें हैं बंद फिर भी आंसू निकल रहे हैं!!

नींदें कहां से आएं इस दर पे करवटें हैं,वहां तुम बदल रहे हो यहां हम बदल रहे हैं!!

डाली से रूठ कर के जिस दिन कली गयी थी,बस उस ही दिन से अपनी क़िस्मत छली गयी थी!!

अंतिम मिलन समझ कर उसे देखने गयी ,तो था प्लेटफ़ॉर्म खाली गाड़ी चली गयी थी!!