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हरे रामा बदरा कारे घिर आये,सजन नाहीं आये 
रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया,कि बलम नाहीं आये रे हरी।।


सखियाँ सब मोरी झूला झूलें,
पेंगिया मारन को ये मन डोले,कि
हरे रामा गावें मिलके कजरिया कि सजन नाहीं आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं 
आये रे हरी।।


सुनो पिया ये देखो बहे पुरवाई,
झूमे जिया और आये अंगड़ाई,कि
हरे रामा जियरा में उठे रे दरदिया कि सजन नाहीं आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं 
आये रे हरी।।


पियवा बिना इ सावन ना भावे,
रहि-2 तनवा में अगिया लगावे,कि 
हरे रामा जरत बा मोरी चुनरिया कि सजन नाहीं आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं
आये रे हरी।।


दादुर मोर इ पपीहा बोलै,
कोयल कूके डाली डोलै,कि
हरे रामा सूनी पड़ी रे सेजरिया कि नाहीं सजन आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में उठे रे दरदिया कि बलम नाहीं
आये रे हरी।।


रिमझिम-2 बरसे है पानी,
भीगत है मोरी चूनर धानी,कि
हरे रामा बरसे कारी बदरिया कि सजन नाहीं 
आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में उठे रे दरदिया कि बलम नाहीं आये रे हरी।।


रहि-2 देखो बिजुली तड़कै,
बादर उमड़ घुमड़ के गरजै,कि
हरे रामा जियरा मिलन को तरसै,कि सजन नाहीं
आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं
आये रे हरी।।


सावन का है ये मौसम सुहाना,
पिया परदेशवा से चले आना,कि
हरे रामा बैरन बुझै कैसे अगिया कि सजन नाहीं आये रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं
आये रे हरी।।


हरे रामा बदरा कारे घिर आये,सजन नाहीं आये 
रे हरी।
हरे रामा देहिया में है तड़पनिया कि बलम नाहीं
आये रे हरी।।


रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव