प्रस्तावना : कल एक व्हाट्सअप समूह पर चर्चा हो रही थी कि छोटे छोटे देशों ने ओलंपिक में सैकड़ों पदक पाये हैं। पदकों के अंतर की बजह क्या है। उसी समय यह कविता लिख गयी। 


धूल में मिल जाते हैं
अनगिनत उपहार
अनगिनत क्षमता
अनगिनत योग्यता
बस रह जाती है एक जुगत
पेट भरने की
किसी तरह जी लेने की
फिर कौन देख पाता है सपने
सपने मरते रहते हैं
किसने सोचा
जितने मर गये सपने
उतने ही पदकों का अंतर है
गिन लीजिये
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'