दुर्योधन भी जीवंत हुआ, दुःशासन भी ..है खडा यहां..
रणभूमिअब वीरान हुई हे धर्मराज तूम गए कहां?
ये कैसी न्याय प्रणाली है.. नहीं त्वरित न्याय मिल पाता है
दर दर की ठोकर मिली यहां तू
कैसा भाग्य विधाता है..?
उस मां के आंसू सुख गए रातों को भी नहीं सोया है
उस पीडा का है अंत नहीं जिसने बेटी को खोया है
जीतेजी कि सी बालिका का सम्मान नहीं कर पाते हो
ये कैसी सहानुभूति तेरी मरने पर दिये जलाते हो..?
गर ऐसा न्याय मिला फिर से बेटी अब लेगी जन्म नहीं
निर्भिक दुःशासन घुम रहा. भय का कोई आभास नहीं..
तारीख पर तारीख मिलती है अब ये फिल्मी है बोल नहीं
कानूनी दावपेच देखा अब शब्द कोष में शब्द नहीं..
इस राम कृष्ण की जन्मभूमि मेघोर तिमिर अब छाया है
नाभी मे अमृत छुपा कहीं फिर आज दशाशन आया है
क्या आज द्रौपदी की मर्यादा का तुझको संग्यान.नहीं..
अर्जुन का रथ भी रिक्त पडा. कौरव का होता अंत नहीं..,?
हे धर्मराज अब जाग उठो तुम सुनो करुण क्रंदन जग का
जग का अंधियारा दूर करो पथ आलोकित करो जीवन का..।
उर्मिला तिवारी
देवरिया.

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