हरने तिमिर अज्ञान का ज्ञान का दीप जलाया है,
उत्थान करने को जगत का निर्वाण भी ठुकराया है,
प्रगटे विवेकानंद से शुचि युगपुरुष जिस देश में,
उस देश का इतिहास ने गौरब सदा ही गया है।
कुंश के आसन बैठकर नित योग जो करते है,
मन की तृष्णा जीत कर भोग को जो तजते है,
होता है उन्ही विभूतियों को साक्षात्कार उस ईश का,
परमार्थ में जो समर्पित अपना तन मन करते है।
रहकर जगत में भी जगत से मोह जो करते नही,
अरथ धरम और काम की चाहत भी जो रखते नही,
रहते सदा निष्काम है वो निर्वाण भी न मांगते,
यूँ ही कोई विवेकानंद और हनुमान जैसा बनता नही।
कह नेति-नेति जिसका सदा गुणगान वेद बखानते,
कर जोड़ कर उनसे सदा वह भक्त निर्वाण मांगते,
तन तो दिखता है मगर चिन्मय अवस्था प्राप्त है,
अमरत्व का वर प्राप्त कर वो मोक्ष को भी त्यागते।
@शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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