आसमान की ख्वाहिश इक है,
वह इस धरती से आन मिले।
दूर क्षितिज पर झुककर नीचे,
धरती को बाहों में ले ले।।
लोगों के भीड़ से दूर वे,
चाहें एकांत में मिलन हो ।
धरती भी चाहती वह मिले,
नभ से मन की कुछ बातें हो।।
पर आसमान को फुर्सत कहाँ?
सारा ब्रह्मांड देखना उसे।
धरती को भी है चैन कहाँ?
अधोलोक उसे हैं देखने।।
यह आसमान औ' धरती की,
ख्वाहिश कभी न पूरी होती।
ऊर्ध्वलोक औ' अधोलोक की,
देखभाल जो करनी होती।।
दूर क्षितिज में लगता मानों ,
धरती पर आकाश झुका है।
आलिंगन कर धरती को ज्यों,
प्रेमपाश में बाँध रहा है।।
पर विधि का विधान है ऐसा,
मिल नहीं सकते दोनों कभी।
हो अगर मिलन नभ धरती का ,
वह समय प्रलयकारी होगी।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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