एक ही माली ने उगाया इन्हें
एक ही जल ने सींचा इन्हें
एक ही सूरज की मिली रोशनी
एक ही वायु ने छुआ इन्हें
फिर क्यूं हुए ये सब विलग
फिर क्यूं कोई मंदिर में गया
फिर क्यूं कोई मज्जिद में गया
फिर क्यूं कोई गया गुरुद्वारे
फिर क्यूं कोई गिरिजाघर में गया
ये किस्मत है या है बटवारा
है या कोई खेल निराला
प्रथक हो गए सभी फूल इस कदर
कि माली को ही प्रथक कर डाला
उस पर भी कमाल ये देखो
कि सिर्फ प्रथक ही नहीं
एक ही माली को
भिन्न भिन्न नामों से
अपनी अपनी भाषा में
एक को दूसरे से श्रेष्ठ कह डाला
इसी छोटी सोच ने
प्रत्येक फूल को प्रथक कर डाला
फूलों के विभाजन से
प्रथक होते सिर्फ धर्म ही नहीं
प्रथक हो जाती सोच भी है
जो निश्चित ही चिंतन का विषय भी है
इसीलिए मैंने प्रभु
छोड़ के सारे फूलों को
मानवता के भाव रूपी फूलों की
भेट तुम्हें समर्पित की है।।
कविता गौतम✍️

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