अधरों पर मीठी मुस्कान लिए,
अमृत -सुधा बरसाते हो,
विष को आत्मसात किये,
मधुरता फैलाते हो।
तुम हो शाश्वत और निरंतर
हम निजता का भान लिए,
तुम पंखुरियों से कोमल
हम प्रभुता का भान लिए;
तुम प्रकम्पन, अखिल
ब्रह्माण्ड के ;
सृस्टि का आधार लिए,
हम कण मात्र सृस्टि के
मिथ्या अभिमान लिए।
तेरे चरणों में अर्पण,
स्वार्थ, लघुता, क्षुद्रता
और समर्पण का भाव लिए ;
तुमसे आबद्ध होने को
मनुज तन, मन में
राधा का भाव लिए,
कर जोड़ पंक्तिबद्ध खड़ा
हुआ है, स्व के उद्धार लिए।
बांसुरी की मधुर तान
सुन तुममें लय हो जाऊँ
हे कृष्ण ! मेरे नीलभ -निलय
तुममें एकाकार हो जाऊँ।
हे मेरे सृजनहार!
तुमसे संबल पाकर
तुम सी बन जाऊँ।
पाकर तुम सा अनुशासन
रस अमृत की बरसाऊँ।
जीवन के बांसुरी को साध
डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "
अनीसाबाद, पटना

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