सावित्री जी रोज अपने पति के अस्पताल से वापसी की राह देख रहीं थीं। वैसे संतोष जी पूर्णतः स्वस्थ थे। पर उस दिन अचानक न जाने कैसे चक्कर खाकर गिर गये। बेटा रोनक उन्हें लेकर अस्पताल भागा। उसी दिन से संतोष जी अस्पताल में हैं। वैसे रोनक रोज माॅ को फोन कर चिंता न करने को कहता। पिता जी की तबीयत भी सही होने की बात करता। पर सावित्री जी की संतोष जी से बात नहीं हो पाती। कभी जैसे ही रोहन बात कराने जाता तो डाक्टर विजिट पर आ जाते। कभी रोहन को दबाई लाने के लिये निकलना होता।

   सावित्री जी को इसी बात से सुख मिलता कि संतोष जी जल्द ठीक होकर घर आने बाले है। एक एक दिन गिन रही थीं।

  अचानक रोहन का फोन आया।

  " माॅ माॅ। आज बाबूजी की अस्पताल से छुट्टी हो रही है। अभी अस्पताल के थोड़े से काम बचे हैं। बाबूजी को लेकर घर आ रहा हूं।"

   सावित्री जी के पैर खुशी के मारे जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। अब थोड़ी देर बाद वह आने बाले हैं। ईश्वर का लाख लाख धन्यावाद कि सब ठीक हो गया।

  माॅ से बात कर रोहन अपनी आंख मलने लगा। पीछे से नर्स की आवाज आयी।

" सर। आप बोडी पैक करा कर ले जायेंगे या चद्दर से ढककर। एंबुलेंस अस्पताल की ही लेकर जायेंगें। या कोई प्राइवेट एंबुलेंस बुक करा ली है।"

  रोहन सोच रहा था कि झूठ बोलकर इतने दिन तो माॅ के प्राण बचा लिये। पर अब क्या करूं।
 दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'