भोर की पहली किरण, धूप सिर तक आ गयी थी! 
सब ओर गहमागहमी फैली थी! 
इतना शोर था की किसी के बात स्पष्ट समझ नहीं आ रही थी! 
उसपर, स्पीकर की आवाज, पडोस में शादी थी! 
एकाशीं उठ जा अब, माँ आप भी न सुबह सुबह ही शुरू हो जाते हो, एक तो लाला अंकल के घर में शादी होने की वजह से पहले ही नींद नहीं आती, उसपर आप अलग परेशान कर देते हो! 
ये भी ठीक है, अब उठ जाओ, तुम्हारे साथ मुझे ससुराल नही जाना है, ताने तो मेरे नाम के ही मिलेगें तुम्है,की  माँ ने कुछ नही सिखाया, अच्छा ऐसे कैसे मिलेगें, जबान न खीच लूंगी, ताना मारने वाले की, ये मां बेटी फिर शुरू हो गये "हो सके तो मुझ गरीब को भी कोई एक कप चाय पिला दो, चौधरी, अजीत पाल बोले, बाबा मै बना कर लाती हूँ!! 
अरे नही, रूको, कोई जरूरत नही है! सारा किचन गंदा कर दोगी! मीरा जी बोली, देख लो बाबा, माँ पहले  डाटती है, की हम कुछ करते नही, जब मूड कुछ करने का होता है, तो करने नही देती, कामचोर अलग समझती है! 
एकांशी तुनकते हुऐ बोली, अब आप और आपकी माँ जाने"
चौधरी अजीत पाल हंसते हुए बोले "मुझे दूर रखो बाबा, माँ बेटी के झगड़े से, चल नीचे फटाफट आ, नाश्ता लगा दिया है! 
और हा आप भी आईऐ, आपको अलग से निमत्रंण नही देना, 
बोलती हुई मीरा जी, तेज कदमों से सीढियाँ उतर गयी! 
बाबा ,इनके नखरे हमसे सहन नही होते, आप कैसे सहन कर लेते हो, एकांशी हंसते हुऐ बोली, वही तो मै भी सोच रहा हूँ! 
चौधरी हूँ, पर घर में, पता नही क्या हूँ! 
चलो बच्चे अब फटाफट नीचे आ जाओ, एकांशी के बाबा, 
नीचे से मीरा जी ने आवाज लगायी, आता हूँ,! 
बोलते हुऐ चौधरी, अजीत पाल जी सीढियों की ओर बढ़ गये! 
एकांशी पंलग से उतर कर विंडो के पास आ गयी, कांच खोला ही था की बाहर नजारा बहुत लुभावना  था, सूरज की किरणे, 
कार्तिक महिने की हल्की गुलाबी, ठंण्ड में, एक अलग ही अहसास दे रही थी! 
सामने दूधिया बादल, बडे सुहावने लग रहे थे!एकांशी की नजरें ठहर गयी, एकटक,,कीलिक्  की आवाज से तंद्रा टूटी एकांशी की, कौन है वहाँ, विंडो से झांककर देखा, एकांशी ने,,,कोई नजर न आया, एकांशी, रूम से बाहर आ गयी! बाहर सारे मकानों की छते मिली होने की वजह से, आना जाने का रास्ता था! एक छोटी सी दीवार थी जिसे आसानी से लांघकर कर आया जाया जा सकता था! 
कृमश: आगे जारी"""""